✍️ योगेश राणा।
बच्चियों के यौन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक: कानून की गलत व्याख्या बर्दाश्त नहीं
न्यूज़ डायरी टुडे, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 18 फरवरी 2026 को दिए अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले को पूरी तरह रद्द (Set Aside) कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी नाबालिग के निजी अंगों को छूना या उसके पायजामे का नाड़ा खोलना/तोड़ना महज ‘तैयारी’ नहीं, बल्कि ‘बलात्कार की कोशिश’ (Attempt to Rape) की श्रेणी में आता है। बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मार्च 2025 में कहा था कि 11 साल की बच्ची के ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना केवल ‘छेड़छाड़’ (Aggravated Sexual Assault) है, रेप की कोशिश नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को कानूनी रूप से गलत करार दिया।
अदालत की फटकार:
चीफ जस्टिस सूर्या कांत की अगुवाई वाली बेंच ने हाई कोर्ट की टिप्पणी को “असंवेदनशील और अमानवीय” बताया। कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका को ऐसे मामलों में केवल तकनीकी कानून नहीं, बल्कि सहानुभूति और संवेदनशीलता (Empathy and Compassion) दिखानी चाहिए और सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों के खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 18 और IPC की धारा 376 (बलात्कार की कोशिश) के तहत मूल आरोपों को बहाल कर दिया है और सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी (NJA) को निर्देश दिया है कि वह जजों के लिए संवेदनशीलता संबंधी दिशानिर्देश तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाए, ताकि भविष्य में इस तरह की असंवेदनशील टिप्पणियां न हों।
क्या था पूरा मामला:-
यह फैसला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के एक मामले से संबंधित था, जिसमें दो आरोपियों ने एक नाबालिग को पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश की थी।