:- व्यापार और आजीविका का अधिकार सर्वोपरि, अकाउंट फ्रीज पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी।
:- अब पूरे अकाउंट पर नहीं, सिर्फ विवादित रकम पर लगेगा ‘लियन’: हाईकोर्ट।
High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने हाल ही में साइबर फ्रॉड के मामलों में बैंक खातों को “ब्लैंकेट फ्रीज” (पूरी तरह बंद) करने की पुलिस की शक्ति पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मनजीव शुक्ला की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि पुलिस केवल संदेह के आधार पर पूरे अकाउंट को होल्ड नहीं कर सकती और यह फैसला खालसा मेडिकल स्टोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें हैदराबाद पुलिस के अनुरोध पर एक स्टोर का पूरा बैंक खाता फ्रीज कर दिया गया था। कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकारों (व्यापार और आजीविका का अधिकार) का उल्लंघन माना है।
कोर्ट द्वारा जारी 5-पॉइंट प्रोटोकॉल!
1-केवल विवादित राशि पर ही रोक (Lien): पुलिस पूरे बैंक खाते को फ्रीज करने का आदेश नहीं दे सकती। वे केवल उस निश्चित राशि (Disputed Amount) पर ‘लिएन’ (Lien) लगाने का अनुरोध कर सकते हैं जो अपराध से जुड़ी संदिग्ध मानी जा रही है।
2-मजिस्ट्रेट को 24 घंटे में सूचना: जैसे ही पुलिस किसी खाते पर लिएन या रोक लगाने का आदेश बैंक को देती है, उसे अनिवार्य रूप से 24 घंटे के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट को इसकी जानकारी देनी होगी। ऐसा न करने पर पुलिस की कार्रवाई को अवैध माना जा सकता है।
3-दस्तावेजों की अनिवार्यता: पुलिस को बैंक को नोटिस भेजते समय FIR की कॉपी या शिकायत का विवरण और जब्ती आदेश (Seizure Order) भी देना होगा। बैंक उन नोटिसों को मानने से इनकार कर सकते हैं जो अधूरे या अस्पष्ट हैं।
4-उचित विश्वास” बनाम “संदेह”: BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) की धारा 106 के तहत खाते पर रोक लगाने के लिए पुलिस के पास सिर्फ संदेह नहीं, बल्कि “ठोस आधार या उचित विश्वास” (Reasonable Belief) होना चाहिए।
5-बैंकों की व्यक्तिगत जवाबदेही: यदि बैंक बिना उचित कानूनी प्रक्रिया (प्रोटोकॉल) के पुलिस के कहने मात्र पर पूरा अकाउंट फ्रीज कर देते हैं, तो वे याचिकाकर्ता को होने वाले वित्तीय और प्रतिष्ठा के नुकसान के लिए सिविल और क्रिमिनल रूप से उत्तरदायी होंगे।