शोर से नहीं, मौन से बना रास्ता : एक स्त्री की आत्मनिर्भर यात्रा।

✍️ लेखक,ऋतु दुबे

न्यूज़ डायरी टुडे, साहित्य।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ बोलना साहस माना जाता है और चुप रहना कमजोरी। मंचों पर ऊँची आवाज़ें तालियाँ बटोरती हैं, जबकि संयम को अक्सर डर का नाम दे दिया जाता है। परिवार हों, मोहल्ले हों या दफ़्तर—जो ज़्यादा बोलता है, वही सही समझा जाता है। पर इस शोर से भरी दुनिया में एक सच्चाई अक्सर अनसुनी रह जाती है—कि मौन भी एक भाषा है, और कई बार सबसे सशक्त भाषा।

शहर के बाहरी हिस्से की एक साधारण-सी कॉलोनी में सौम्या रहती थी। न वह ज़्यादा बोलती थी, न अपनी परेशानियों का प्रदर्शन करती थी। लोग उसे “शांत स्वभाव की” कहते थे, कुछ उसे “बेचारी” भी मान लेते थे। पर कोई यह नहीं समझ पाया कि सौम्या की चुप्पी मजबूरी नहीं थी—वह उसका सचेत चुनाव थी।
सौम्या का पति अरुण एक निजी फैक्ट्री में काम करता था। सालों की मेहनत के बाद भी बचत नाममात्र की थी, जैसा कि देश के अधिकतर मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों में होता है। फिर एक दिन फैक्ट्री बंद हो गई। एक नोटिस, कुछ खोखले आश्वासन, और अचानक बेरोज़गारी।

नौकरी के साथ अरुण का आत्मविश्वास भी टूट गया। घर में आर्थिक दबाव बढ़ा तो मानसिक तनाव भी गहराने लगा। झुंझलाहट कभी-कभी शराब का रूप ले लेती। वह चिल्लाता, शिकायत करता, अपनी किस्मत को कोसता।
सौम्या जवाब नहीं देती थी।
लोग कहते—
“इतना चुप रहना भी ठीक नहीं।”
“अगर विरोध नहीं करोगी तो आदमी बिगड़ जाएगा।”
लेकिन सौम्या जानती थी—हर समय बोला गया सच हालात नहीं बदलता। कुछ परिस्थितियों में मौन ही वह जगह देता है, जहाँ से समाधान जन्म लेता है।
उनके दो बच्चे थे—बड़ी बेटी आकृति और छोटा बेटा चित्रांश। सरकारी स्कूल में पढ़ते, सीमित साधनों में पलते। आकृति पढ़ाई में अच्छी थी, पर घर के हालात देखकर अक्सर अपने सपनों को दबा लेती। चित्रांश छोटी उम्र में ही समझ गया था कि घर में शोर बढ़े तो चुप रहना ही बेहतर होता है।
शाम को कॉलोनी की औरतें नल के पास इकट्ठा होतीं। बातें होतीं—महँगाई, सरकार, पतियों की नाकामियाँ और दूसरों की ज़िंदगी पर फैसले। सौम्या भी वहाँ आती, पर ज़्यादातर खामोश रहती। उसकी यह चुप्पी लोगों को असहज करती थी।
“इतना सह कैसे लेती है?”
“कुछ तो बोलना चाहिए।”
पर सौम्या जानती थी—शोर मचाने से पहले ज़मीन चाहिए, और ज़मीन धैर्य से बनती है।
एक दिन कॉलोनी के बोर्ड पर सरकारी कौशल प्रशिक्षण योजना की सूचना लगी। सीमित सीटें थीं। ज़्यादातर लोगों ने उसे औपचारिकता समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया। अरुण ने भी कहा,
“ये सब हमारे जैसे लोगों के लिए नहीं है।”
सौम्या ने कुछ नहीं कहा।
उस रात, जब पूरा घर सो गया, उसने वह सूचना फिर से पढ़ी। चुपचाप फॉर्म भरा। न किसी से सलाह ली, न किसी को बताया।
तीन महीने बाद चयन सूची आई। उसमें सौम्या का नाम था।
उस दिन भी उसने कोई घोषणा नहीं की। सुबह घर, दोपहर प्रशिक्षण, शाम को वही दिनचर्या। सिलाई सीखते हुए उसने सिर्फ़ कपड़े नहीं सिले—उसने अपनी टूटी हुई पहचान को धीरे-धीरे जोड़ना शुरू किया।
पहली कमाई बहुत छोटी थी। लेकिन जिस दिन उसने अपने हाथों से कमाए पैसे मेज़ पर रखे, उस दिन उसका मौन—जिसे लोग कमज़ोरी समझते थे—सबसे स्पष्ट उत्तर बन गया।
अरुण कुछ नहीं बोला।
पर पहली बार उसकी आँखों में सौम्या के लिए संकोच और सम्मान एक साथ था।
धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। शब्द कम हुए, पर स्थिरता बढ़ी। आकृति की पढ़ाई पर अब सवाल नहीं उठते थे। जब कॉलेज जाने की बात आई, तो वही पुराने डर सामने थे—खर्च, समाज, भविष्य।
तब सौम्या ने बस एक वाक्य कहा—
“आकृति पढ़ेगी। रास्ता मैं बना लूँगी।”
न कोई भाषण, न कोई तर्क।
बस एक वाक्य—जिसमें वर्षों का मौन, संघर्ष और आत्मबल समाया हुआ था।
समाज को समझने में समय लगा, पर धीरे-धीरे यह साफ़ होने लगा कि सौम्या की चुप्पी उसकी हार नहीं, उसकी रणनीति थी। उसने शोर नहीं मचाया, इसलिए टूटी नहीं। उसने बहस नहीं की, इसलिए अपनी दिशा नहीं खोई।
आज भी सौम्या ज़्यादा नहीं बोलती।
पर उसकी खामोशी में आत्मसम्मान है।
उसकी चुप्पी में आत्मनिर्भरता की नींव है। और उसकी शांति में वह उत्तर है, जो शोर कभी नहीं दे सकता।


क्योंकि सच यही है—
हर मौन खाली नहीं होता।
कुछ मौन भीतर की व्यवस्था का प्रमाण होते हैं।