✍️ वसंत जोशी
बेबाक़, बिंदास और बुनियादी: संजय सिंह का सियासी सफ़र।
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हिंदुस्तान की सियासत के मौजूदा दौर में अगर किसी नाम को बेबाक़ी, जुर्रत और अवाम की नुमाइंदगी का पैमाना माना जाए, तो वह नाम है—संजय सिंह। आम आदमी पार्टी के दिल्ली से राज्यसभा सांसद संजय सिंह आज विपक्ष की सबसे बुलंद और बेखौफ आवाज़ के तौर पर पहचाने जाते हैं। उनकी सदा संसद के ऊँचे गुम्बदों से निकलकर सीधे आम आदमी की गलियों तक गूँजती है। मगर इस मुक़ाम तक पहुँचने का सफ़र न तो आसान था और न ही शाही—यह सफ़र सब्र, संघर्ष और सिद्धांतों से लिखा गया है।
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के एक छोटे-से क़स्बे में जन्मे संजय सिंह का बचपन सादगी और संस्कारों की छाँव में बीता। माता-पिता दोनों शिक्षक थे, लिहाज़ा घर का माहौल इल्म, ईमान और अनुशासन से सराबोर था। किताबें उनकी साथी थीं और सवाल पूछना उनकी आदत। बचपन में ही उन्होंने समझ लिया था कि ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ अपना भला नहीं, बल्कि समाज की भलाई के लिए खड़ा होना है।
तालीम पूरी करने के बाद संजय सिंह ने माइनिंग इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। यह तालीम उन्हें आरामदेह रोज़गार की राह दिखा सकती थी, मगर उनका दिल सरकारी फ़ाइलों या निजी फ़ायदों में नहीं, बल्कि अवाम की तकलीफ़ों में धड़कता था। सन 1994 में उन्होंने “आज़ाद समाज सेवा समिति” की बुनियाद रखी। इस तंजीम के ज़रिये उन्होंने ग़रीबों की मदद, तालीम के प्रसार और रोज़गार के मौक़े मुहैया कराने का बीड़ा उठाया।
समाज सेवा के मैदान में उतरते-उतरते संजय सिंह को यह एहसास हुआ कि असली तब्दीली महज़ राहत बाँटने से नहीं, बल्कि निज़ाम को बदलने से आएगी। सन 2006 में जब सूचना के अधिकार का आंदोलन उठा, तो वे पूरी शिद्दत से उसमें शामिल हुए। इसके बाद अन्ना हज़ारे की क़यादत में चला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन उनके जीवन का अहम मोड़ साबित हुआ। दिल्ली की सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब, और उसी भीड़ में संजय सिंह—जोश से लबरेज़, अवाम की आवाज़ बनकर उभरे। यहीं से उनकी पहचान बनी और वे आम आदमी पार्टी के बुनियादी रहनुमाओं में शुमार हुए।
पार्टी के प्रवक्ता के तौर पर संजय सिंह ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान और ओडिशा जैसे राज्यों में संगठन की बुनियाद मजबूत की। उनकी सादगी, साफ़गोई और बेबाक़ अंदाज़ ने उन्हें आम लोगों के दिलों के क़रीब ला खड़ा किया। वे उन नेताओं में नहीं जो मंच से तक़रीर कर चले जाएँ, बल्कि वे अवाम के बीच बैठकर उनकी बात सुनते हैं, उनकी पीड़ा को अपनी आवाज़ बनाते हैं।
सन 2018 में संजय सिंह राज्यसभा के सदस्य बने। संसद के भीतर उनका अंदाज़ जुदा और असरदार रहा। वे महज़ सियासी बयानबाज़ी नहीं करते, बल्कि सीधे और दोटूक लफ़्ज़ों में जनता के मसलों को पेश करते हैं। महँगाई हो, बेरोज़गारी हो या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर सवाल—संजय सिंह हर मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा करने से पीछे नहीं हटते। कई बार इसी बेबाक़ी के चलते उन्हें विरोध, आलोचना और यहां तक कि संसद से निलंबन का सामना भी करना पड़ा, मगर उन्होंने कभी अपने उसूलों से सौदा नहीं किया।
निजी ज़िंदगी में भी संजय सिंह उतने ही सादा हैं, जितने अपने सार्वजनिक जीवन में। उनकी जीवन संगिनी अनीता सिंह और दो बच्चों के साथ वे एक साधारण पारिवारिक जीवन जीते हैं। यही सादगी और सच्चाई उन्हें जनता से जोड़े रखती है।
संजय सिंह की कहानी इस बात की गवाही देती है कि सियासत महज़ सत्ता की सीढ़ी नहीं, बल्कि सेवा और संघर्ष का मैदान भी हो सकती है। अगर नीयत साफ़ हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो एक साधारण परिवार का बेटा भी संसद के दरबार में अवाम की सबसे बुलंद आवाज़ बन सकता है। उनकी यात्रा उन नौजवानों के लिए मशाल है, जो राजनीति को बदलाव का ज़रिया बनाना चाहते हैं—न कि सिर्फ़ तख़्त और ताज का खेल।