Inspirational Hindi Story : एक मुलाक़ात, कई उत्तर | ऋतु दुबे की प्रेरक साहित्यिक कथा।

एक मुलाक़ात, कई उत्तर

(मार्गदर्शन और आत्मबोध की साहित्यिक कथा)


मध्य भारत के हृदय में बसा शहर जबलपुर—जहाँ नर्मदा की धारा जितनी शांत दिखती है, उतनी ही गहराई अपने भीतर समेटे रहती है। इसी शहर की एक पुरानी कॉलोनी में वर्षों से एक संयुक्त परिवार रहता था। घर बड़ा था, पर सोच संकुचित। परंपराएँ इतनी गहरी थीं कि उनमें बदलाव का विचार भी विद्रोह माना जाता था।
इसी घर में रहती थी एक किशोरी—श्रेया।
श्रेया उम्र में भले ही छोटी थी, लेकिन उसका मन लगातार प्रश्न करता था। वह अपनी माँ कविता को रोज़ देखती—घर की धुरी बनी हुई। सुबह की पहली आहट से लेकर रात के अंतिम दीये तक, कविता ही थीं जो सबको जोड़कर रखती थीं।
कविता पढ़ी-लिखी थीं। उनके मायके में संवाद था, समझ थी। पर विवाह के बाद उन्होंने स्वयं को इस विश्वास में ढाल लिया था कि शांति बनाए रखना ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने कभी विरोध नहीं किया। न ऊँची आवाज़, न आँसू। बस एक गहरा मौन और अथाह धैर्य।
श्रेया इस मौन को समझ नहीं पाती थी।
एक चुप्पी, जो प्रश्न बन गई
घर में जब कोई निर्णय होता, कविता से कभी नहीं पूछा जाता। श्रेया यह देखती और भीतर ही भीतर बेचैन हो जाती।
“माँ, आप कुछ क्यों नहीं कहतीं?”
कविता बस इतना कहतीं—
“हर बात का जवाब शब्दों से नहीं दिया जाता, बेटा।”
पर श्रेया के लिए यह उत्तर अधूरा था।
वह स्वभाव से जिज्ञासु थी, तर्कशील थी। स्कूल में वह सवाल पूछती, किताबों से आगे सोचती। लेकिन घर में उससे अपेक्षा थी—चुप रहने की, मान लेने की।
इसी बीच उसकी एक सहेली बनी—कव्या। कव्या की माँ थीं पल्लवी—शहर के ही एक सरकारी कार्यालय में अधिकारी, जो सरकारी क्वार्टर में रहती थीं। पल्लवी का व्यक्तित्व अलग था—संतुलित, आत्मविश्वासी और स्पष्ट।
जब भी श्रेया कव्या के घर जाती, वहाँ उसे एक अलग ही ऊर्जा महसूस होती—न शोर, न दमन; न चुप्पी, न कटुता।
श्रेया के मन में यह विचार पनपने लगा—
शायद यही सही जीवन है।
भीतर का टूटना
एक दिन घर में एक छोटी-सी बात पर श्रेया को सबके सामने कठोर शब्द सुनने पड़े। कारण तुच्छ था, पर भाषा तीखी। माँ कविता हमेशा की तरह चुप रहीं।
उस क्षण श्रेया के भीतर कुछ टूट गया।
वह बिना कुछ कहे घर से निकल पड़ी और सीधी कव्या के घर पहुँच गई। सरकारी क्वार्टर की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए उसके आँसू रुक नहीं रहे थे।
दरवाज़ा पल्लवी ने खोला।
श्रेया को देखते ही उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस कहा—
“अंदर आओ।”
एक गिलास पानी, कुछ पल की खामोशी—और फिर पल्लवी ने बहुत सहज स्वर में कहा—
“अब जब मन तैयार हो, तब बोलना।”
काउंसलिंग : जो उपचार बन गई
श्रेया पहली बार बिना डर, बिना संकोच बोल पड़ी।
घर का दबाव, माँ की चुप्पी, अपनी घुटन—सब कुछ बहता चला गया।
पल्लवी पूरी तन्मयता से सुनती रहीं। न बीच में टोका, न सलाह दी।
फिर उन्होंने पूछा—
“तुम्हें सच में क्या सबसे ज़्यादा दुख देता है?”
श्रेया ने कहा—
“माँ का चुप रहना।”
पल्लवी कुछ पल शांत रहीं, फिर बोलीं—
“क्या तुम्हें लगता है कि चुप रहना हमेशा कमजोरी होती है?”
श्रेया निरुत्तर हो गई।
पल्लवी ने धीरे से कहा—
“तुम्हारी माँ जिस घर को वर्षों से संभाल रही हैं, वह भी एक शक्ति है। बस वह शक्ति शोर नहीं करती।”
फिर उन्होंने अपना अनुभव साझा किया—
“सरकारी नौकरी, आत्मनिर्भरता, स्पष्ट बोलना—इन सबके बावजूद मेरे जीवन में भी संघर्ष हैं। फर्क बस इतना है कि मैं बोलकर थकान निकाल देती हूँ, और तुम्हारी माँ चुप रहकर।”
यह सुनकर श्रेया की आँखें खुल गईं।
सलाह, जो आदेश नहीं थी
पल्लवी ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा—
“जीवन में संतुलन सबसे ज़रूरी है।
केवल सहनशीलता भी व्यक्ति को भीतर से खोखला कर देती है,
और केवल संघर्ष उसे कठोर बना देता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“तुम अपनी माँ से धैर्य सीखो,
और मुझसे अपनी बात रखना।
दोनों को साथ लेकर चलोगी, तो टूटोगी नहीं।”
यह कोई उपदेश नहीं था।
यह मार्गदर्शन था—जो मन के भीतर उतर गया।
श्रेया को पहली बार लगा

सलाह सच में एक चमकता हुआ उपहार हो सकती है।
बदलाव नहीं, समझ
उस दिन के बाद श्रेया बदली नहीं—परिपक्व हो गई।
वह अब माँ को कमज़ोर नहीं मानती थी।
वह पल्लवी को आदर्श नहीं, मार्गदर्शक समझती थी।
उसने सीख लिया—
कब चुप रहना है,
कब बोलना है,
और कब स्वयं को बचाने के लिए दूरी बनानी है।
फलित जीवन
समय बीतता गया। श्रेया ने शिक्षा में उत्कृष्टता पाई। कॉलेज में उसकी पहचान एक संतुलित, स्पष्ट और संवेदनशील व्यक्तित्व की बनी।
घर में जब कभी अन्याय होता, वह शांत लेकिन दृढ़ स्वर में बोलती।
कविता पहली बार बेटी को देख मुस्कुराईं—आँखों में गर्व और सुकून था।
उन्होंने कहा—
“तुम मुझसे अलग हो।”
श्रेया ने उत्तर दिया—
“नहीं माँ, मैं आप और पल्लवी आंटी—दोनों की सीख हूँ।”
सलाह का विस्तार
सालों बाद, श्रेया स्वयं काउंसलिंग के क्षेत्र में आई। जब भी कोई किशोरी उसके सामने बैठकर टूटती, वह वही करती जो पल्लवी ने किया था—
पहले सुनना,
फिर समझना,
और अंत में रास्ता दिखाना।
क्योंकि उसने जीवन से यह सीखा था—
सलाह आदेश नहीं होती।
वह एक दीपक होती है—
जो रास्ता दिखाती है,
चलना हमें स्वयं होता है