राम’ का नाम, मनोरंजन का दाम; फिर टैक्स में क्यों ‘रावण’ जैसा काम?

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✍️ Yogesh Rana
‘ News Diary Today | Noida News
नोएडा न्यूज़ | त्योहारों का सीजन आते ही देश के कोने-कोने में रामलीला के भव्य आयोजन और उनके साथ सजने वाले रंग-बिरंगे मेले शुरू हो चुके हैं। नोएडा स्टेडियम से लेकर पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान तक, हर जगह लाखों की भीड़ उमड़ रही है। लेकिन इस धार्मिक और सांस्कृतिक उल्लास के पीछे मनोरंजन और व्यापार के नाम पर करोड़ों रुपये की टैक्स चोरी का एक बड़ा खेल भी धड़ल्ले से चल रहा है। बता दें कि जब आम जनता बच्चों के झूले, मौत के कुएं और चाट-पकौड़ी के लिए अपनी जेब से एक-एक पाई ईमानदारी से चुका रही है, तो सवाल उठता है कि इस भारी-भरकम कमाई का हिस्सा सरकार को टैक्स के रूप में क्यों नहीं मिल रहा?
कैसे होता है टैक्स चोरी का यह ‘भव्य’ खेल?
मेलों में होने वाली इस टैक्स चोरी के पीछे कई तरह के सुनियोजित हथकंडे अपनाए जाते हैं।मेले में लगे 90% से ज्यादा झूले, सर्कस और बड़े फूड स्टॉल्स पर ऑनलाइन पेमेंट (UPI या कार्ड) लेने से साफ मना कर दिया जाता है। टिकट काउंटरों पर केवल कैश स्वीकार किया जाता है, ताकि इस लेनदेन का कोई डिजिटल फुटप्रिंट या आधिकारिक रिकॉर्ड न रहे। बच्चों के झूलों और अन्य प्रदर्शनियों के लिए जो टिकट दिए जाते हैं, वे अक्सर साधारण रंगीन कागज की पर्चियां होती हैं। इन पर न तो कोई सीरियल नंबर होता है, न ही जीएसटी (GST) या किसी अन्य टैक्स का जिक्र। इन पर्चियों को शाम होते ही नष्ट कर दिया जाता है। मेले के ठेकेदार और बड़े स्टॉल संचालक अधिकारियों को अपनी कमाई बेहद मामूली दिखाते हैं। रिकॉर्ड पर दिखाया जाता है कि मेला घाटे में चल रहा है या सिर्फ खर्च निकल रहा है, जबकि असलियत में रोजाना लाखों-करोड़ों का नकद लेनदेन होता है।मुख्य आयोजन समिति या ठेकेदार प्रशासनिक नियमों और शर्तों की अनदेखी कर जमीन को ऊंचे दामों पर छोटे दुकानदारों को ‘सब-लेट’ (किराए पर) दे देते हैं। यह पूरा लेन-देन भी पूरी तरह से ब्लैक मनी (काले धन) में होता है।
जब जनता दे रही पूरा दाम, तो टैक्स से क्यों परहेज?
एक आम नागरिक जब किसी सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाता है या किसी मॉल के गेमिंग जोन में जाता है, तो उसे टिकट के साथ जीएसटी (GST) चुकाना पड़ता है। रामलीला मेलों में भी झूलों की टिकटें 200 से 300 तक पहुंच चुकी हैं। जनता यहां भी मनोरंजन का पूरा व्यावसायिक दाम चुका रही है। ऐसे में टैक्स न चुकाना सीधे तौर पर सरकारी खजाने और देश के विकास को नुकसान पहुंचाना है। वहीं इस मामले की गंभीरता को देखते हुए संयुक्त आयुक्त संजय कुशवाहा ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि, “इस पूरे मामले से जुड़े सभी पहलुओं की गहनता से जांच कराई जाएगी। जनता से जुड़ी सुविधाओं में टैक्स चोरी और वित्तीय गड़बड़ी को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो संबंधित ठेकेदारों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”
सुरक्षा नियमों की अनदेखी और अवैध वसूली?
टैक्स चोरी के इस खेल के साथ-साथ मेलों में जनता की जान से खिलवाड़ और भ्रष्टाचार के अन्य मामले भी जुड़े हैं।कई जगहों से शिकायतें आ रही हैं कि बड़े-बड़े झूले और मौत का कुआं बिना किसी आधिकारिक सुरक्षा या फिटनेस जांच के चलाए जा रहे हैं, जिससे बड़े हादसों का डर बना रहता है।कुछ मेला समितियों पर दुकानदारों से तय किराए से ज्यादा अवैध वसूली करने और रसीद न देने के गंभीर आरोप आरोप लगाए हैं।
विशेषज्ञों का क्या कहना है?
कर विशेषज्ञों का मानना है कि आस्था और मनोरंजन की आड़ में इस तरह की टैक्स चोरी को रोकना बेहद जरूरी है। इसके लिए स्थानीय प्रशासन और जीएसटी विभाग को मेलों में ‘सरप्राइज ऑडिट’ और अनिवार्य डिजिटल पेमेंट जैसे कड़े कदम उठाने चाहिए। जब तक हर टिकट को डिजिटल रूप से ट्रैक नहीं किया जाएगा, तब तक आस्था के इस मंच के पीछे टैक्स चोरी का यह ‘रावण’ इसी तरह मुस्कुराता रहेगा।

