यूपी में 90 दिनों में खाली होंगी सरकारी जमीनें, लापरवाह अफसरों पर सीधे दर्ज होगा BNS 316 का मुकदमा!

उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के सख्त रुख की चर्चा तेज है। तालाबों और चरागाहों समेत सार्वजनिक भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने के निर्देशों के साथ लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही पर भी जोर दिया गया है।
News Diary Today | Noida News
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में सरकारी और सार्वजनिक जमीनों पर अवैध कब्जों को लेकर अब तक का सबसे बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। अदालत ने पूरे सूबे में तालाबों, चरागाहों और सार्वजनिक उपयोगिता की जमीनों से 90 दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है। इस आदेश की सबसे बड़ी रोचकता यह है कि अगर ग्राम प्रधान, लेखपाल या राजस्व अधिकारी लापरवाही बरतते हैं, तो उन्हें सीधे जेल जाना पड़ सकता है, क्योंकि इसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316 के तहत आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) माना जाएगा। बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने राज्य में फैले अवैध कब्जों के खिलाफ एक ऐतिहासिक और बेहद कड़ा 24 पन्नों का दिशा-निर्देश जारी किया है। यह आदेश मिर्जापुर के चुनार क्षेत्र के चौका गांव में एक तालाब पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए आया।अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि ग्राम सभा की जमीन एक “भरोसे में सौंपी गई संपत्ति” (Entrusted Property) है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है। यदि अधिकारी इस जिम्मेदारी को निभाने में नाकाम रहते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के भरोसे के साथ धोखा है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण की जानकारी छिपाना या उसे न हटाना, कब्जेदार के साथ ‘आपराधिक साजिश और दुष्प्रेरण’ के समान है। इसके तहत लापरवाह अफसरों पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316 के तहत मुकदमा चलेगा।ग्राम प्रधान और लेखपाल को किसी भी अवैध कब्जे की जानकारी 60 दिनों के भीतर संबंधित तहसीलदार को देनी होगी। इसके बाद कारण बताओ नोटिस जारी होने के 90 दिनों के भीतर हटाने की पूरी कानूनी कार्यवाही मुकम्मल करनी होगी।यदि शिकायत के बाद भी प्रधान या लेखपाल कोई एक्शन नहीं लेते, तो सूबे का कोई भी आम नागरिक उनके खिलाफ सीधे हाईकोर्ट में दीवानी अवमानना (Civil Contempt) की कार्यवाही शुरू करवा सकता है।कोर्ट ने सभी जिलाधिकारियों (DMs) को बिना किसी राजनीतिक दबाव या पक्षपात के काम करने को कहा है। अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस महकमे को पूरी सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने में राजस्व टीम की मदद करने का सख्त निर्देश है।जिस नागरिक ने अवैध कब्जे की शिकायत दर्ज कराई है, उसे बेदखली प्रक्रिया के हर चरण में अपनी बात रखने का पूरा मौका (Hearing Opportunity) दिया जाएगा।हाईकोर्ट के इस अभूतपूर्व फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है, क्योंकि अब तक सिर्फ अवैध कब्जा करने वाले ही रडार पर होते थे, लेकिन अब संरक्षण देने वाले या चुप्पी साधने वाले सरकारी नुमाइंदे भी सीधे आपराधिक मुकदमों के घेरे में आ गए हैं।


