स्ट्रोक दिवस विशेष : स्ट्रोक के 3 लक्षण दिखें तो न करें इंतजार, तुरंत पहुंचें अस्पताल; समय पर इलाज से बच सकती है जान

चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ में अचानक कमजोरी और बोलने में परेशानी हो सकती है खतरे की घंटी। एम्स नई दिल्ली के न्यूरोइमेजिंग एवं इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के नाम से साझा विशेषज्ञ जानकारी के आधार पर जानिए स्ट्रोक के लक्षण, आधुनिक इलाज और बचाव के तरीके।
News Diary Today | Special Story
नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि परिवार का कोई सदस्य सुबह बिल्कुल सामान्य था, लेकिन अचानक उसका चेहरा एक तरफ झुकने लगा, हाथ से गिलास छूट गया या वह ठीक से बोल नहीं पा रहा है। ऐसी स्थिति में इसे थकान, कमजोरी या उम्र का असर समझकर इंतजार करना भारी पड़ सकता है। ये स्ट्रोक यानी मस्तिष्काघात के संकेत हो सकते हैं, जिसमें हर मिनट कीमती होता है।
स्ट्रोक के दौरान मस्तिष्क तक खून पहुंचना रुक सकता है या मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फट सकती है। समय पर इलाज न मिलने पर मरीज की जान जा सकती है या उसे चलने, बोलने और रोजमर्रा के काम करने में स्थायी परेशानी हो सकती है। हालांकि, शुरुआती लक्षण पहचानकर तुरंत अस्पताल पहुंचने से गंभीर नुकसान कम करने की संभावना बढ़ सकती है।
एम्स, नई दिल्ली के न्यूरोइमेजिंग एवं इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं प्रमुख तथा न्यूरोसाइंसेज सेंटर के प्रमुख डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ (Dr. Shailesh B. Gaikwad) से संबंधित विशेषज्ञ जानकारी में स्ट्रोक की शुरुआती पहचान, सही समय पर उपचार और आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के महत्व पर जोर दिया गया है।
स्ट्रोक क्या है और यह कितनी गंभीर स्थिति है?
आसान भाषा में समझें तो हमारा मस्तिष्क शरीर के हर हिस्से को नियंत्रित करता है। इसे काम करने के लिए लगातार खून और ऑक्सीजन की जरूरत होती है। जब किसी कारण से मस्तिष्क तक रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या वहां रक्तस्राव होने लगता है, तो मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है। इसी स्थिति को स्ट्रोक कहा जाता है।
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है।
- इस्केमिक स्ट्रोक: जब खून का थक्का मस्तिष्क की रक्तवाहिका में रुकावट पैदा कर देता है।
- हेमरेजिक स्ट्रोक: जब मस्तिष्क की कोई रक्तवाहिका फट जाती है और वहां रक्तस्राव होने लगता है।
दोनों स्थितियां गंभीर हैं, लेकिन इनके इलाज अलग-अलग होते हैं। इसलिए स्ट्रोक के लक्षण सामने आने पर बिना जांच के कोई दवा देना खतरनाक हो सकता है।
न्यूरोइमेजिंग और इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी स्ट्रोक की पहचान तथा उपचार की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के विभाग से जुड़ी विशेषज्ञता का यह क्षेत्र मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं की इमेजिंग और चुनिंदा मरीजों में कैथेटर के जरिए किए जाने वाले उपचार से संबंधित है।
चेहरे का टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी और लड़खड़ाती आवाज को न करें नजरअंदाज
स्ट्रोक के लक्षण अक्सर अचानक सामने आते हैं। कई बार मरीज खुद अपनी परेशानी ठीक से समझा भी नहीं पाता। ऐसे में परिवार के सदस्यों और आसपास मौजूद लोगों की सतर्कता उसकी जान बचाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।
स्ट्रोक पहचानने के लिए FAST फॉर्मूला याद रखें।
F – Face (चेहरा): व्यक्ति से मुस्कुराने को कहें। यदि चेहरे का एक हिस्सा नीचे झुका हुआ दिखे या मुस्कुराने पर दोनों तरफ समान हरकत न हो, तो सतर्क हो जाएं।
A – Arm (हाथ): व्यक्ति से दोनों हाथ उठाने को कहें। यदि एक हाथ अचानक कमजोर हो जाए, नीचे गिरने लगे या उसमें सुन्नपन महसूस हो, तो यह खतरे का संकेत हो सकता है।
S – Speech (बोलना): व्यक्ति से कोई आसान वाक्य बोलने को कहें। यदि उसकी आवाज लड़खड़ा रही है, शब्द स्पष्ट नहीं निकल रहे या वह आपकी बात समझ नहीं पा रहा है, तो स्ट्रोक की आशंका हो सकती है।
T – Time (समय): इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं। यह देखने के लिए इंतजार न करें कि कुछ देर में सब ठीक हो जाएगा या नहीं।
डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के विशेषज्ञता क्षेत्र से जुड़ी स्ट्रोक इमेजिंग और इंटरवेंशनल उपचार की प्रक्रिया में समय पर जांच महत्वपूर्ण होती है। मरीज को अस्पताल पहुंचने में देरी होने से उपचार के कुछ विकल्प सीमित हो सकते हैं। इसलिए लक्षणों की शुरुआत का समय नोट करना और चिकित्सा टीम को सही जानकारी देना उपयोगी है।
स्ट्रोक के ये लक्षण भी हो सकते हैं
हर मरीज में चेहरे का टेढ़ा होना या बोलने में परेशानी होना जरूरी नहीं है। कुछ लोगों में दूसरे लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं, जैसे:
- अचानक एक या दोनों आंखों से कम दिखाई देना या दोहरा दिखना।
- अचानक संतुलन बिगड़ना या चलने में परेशानी होना।
- शरीर के एक तरफ अचानक कमजोरी या सुन्नपन आना।
- बिना स्पष्ट कारण के अचानक बहुत तेज सिरदर्द होना।
ऐसे लक्षणों को भी गंभीरता से लें, खासकर जब वे अचानक शुरू हों।
लक्षण कुछ मिनट में ठीक हो जाएं तो क्या खतरा टल गया?
नहीं। यही वह गलती है, जो आगे चलकर गंभीर साबित हो सकती है।
कभी-कभी स्ट्रोक जैसे लक्षण कुछ मिनटों में ठीक हो जाते हैं। इसे ट्रांजिएंट इस्केमिक अटैक (TIA) कहा जा सकता है। यह भविष्य में बड़े स्ट्रोक का चेतावनी संकेत हो सकता है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति का हाथ अचानक कमजोर हुआ, बोलने में परेशानी हुई और फिर वह सामान्य हो गया, तब भी उसे तत्काल चिकित्सकीय जांच की जरूरत है। लक्षण खत्म होने का मतलब यह नहीं है कि खतरा पूरी तरह टल गया है।
स्ट्रोक होने पर परिवार के लोग तुरंत क्या करें?
ऐसी स्थिति में घबराने के बजाय तेजी से सही कदम उठाना जरूरी है।
- तुरंत एम्बुलेंस बुलाएं: मरीज को स्ट्रोक के उपचार की सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाने में देरी न करें।
- समय नोट करें: लक्षण पहली बार कब दिखे, यह लिख लें। यदि शुरुआत का समय पता नहीं है, तो मरीज को आखिरी बार सामान्य अवस्था में कब देखा गया था, इसकी जानकारी दें।
- खुद से दवा न दें: एस्पिरिन या कोई अन्य दवा बिना चिकित्सकीय सलाह न दें। रक्तस्राव वाले स्ट्रोक में कुछ दवाएं नुकसान पहुंचा सकती हैं।
- खाना-पानी न दें: मरीज को निगलने में परेशानी हो सकती है, जिससे भोजन या पानी सांस की नली में जाने का खतरा रहता है।
- मरीज को अकेला न छोड़ें: उसकी स्थिति पर नजर रखें और एम्बुलेंस कर्मियों को लक्षणों की जानकारी दें।
याद रखें: स्ट्रोक के लक्षणों में घरेलू नुस्खे आजमाना या मरीज को आराम करने के लिए सुला देना अस्पताल पहुंचने का विकल्प नहीं है।
स्ट्रोक का इलाज कितनी जल्दी होना चाहिए?
स्ट्रोक में समय का सीधा संबंध इलाज के विकल्पों और मरीज के संभावित परिणामों से होता है। अस्पताल में डॉक्टर पहले मरीज की स्थिति का आकलन करते हैं और जरूरत के अनुसार सीटी स्कैन, एमआरआई तथा रक्तवाहिकाओं की जांच कराते हैं।
इन जांचों से पता चलता है कि मस्तिष्क में थक्का है या रक्तस्राव। इसके बाद विशेषज्ञ तय करते हैं कि मरीज के लिए कौन-सा उपचार सबसे उपयुक्त होगा।
थक्का घोलने वाली दवा से मिल सकती है मदद
इस्केमिक स्ट्रोक के चुनिंदा मरीजों को नस के जरिए थक्का घोलने वाली दवा दी जा सकती है। आमतौर पर पात्र मरीजों में यह उपचार लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर दिया जाता है।
कुछ चुनिंदा मरीजों में उन्नत इमेजिंग और अन्य चिकित्सकीय मानदंडों के आधार पर इस अवधि के बाद भी उपचार संभव हो सकता है। लेकिन इसके लिए विशेषज्ञों का मूल्यांकन जरूरी है।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अस्पताल पहुंचने के लिए साढ़े चार घंटे तक इंतजार किया जाए। मरीज को जितनी जल्दी चिकित्सा सहायता मिले, उतना बेहतर है।
मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी: बिना खोपड़ी खोले निकाला जा सकता है थक्का
स्ट्रोक के आधुनिक इलाज में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी एक महत्वपूर्ण तकनीक है। इसमें कैथेटर को रक्तवाहिका के रास्ते मस्तिष्क तक पहुंचाकर बड़ी रक्तवाहिका में फंसे थक्के को निकाला जाता है।
यह प्रक्रिया इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी के क्षेत्र की महत्वपूर्ण तकनीकों में शामिल है। डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के विभाग का विशेषज्ञता क्षेत्र भी न्यूरोइमेजिंग और इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी से संबंधित है, जो मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं की जांच और चयनित मरीजों में ऐसे उपचारों के लिए महत्वपूर्ण है।
उपयुक्त मरीजों में थ्रोम्बेक्टॉमी से मस्तिष्क में रक्त प्रवाह बहाल करने और दिव्यांगता का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है। कुछ चुनिंदा मरीजों में जांच के नतीजों के आधार पर लक्षण शुरू होने के 24 घंटे तक इस प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, हर मरीज इस उपचार के लिए उपयुक्त नहीं होता। इसका निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टर इमेजिंग और मरीज की स्थिति के आधार पर लेते हैं।
अगर मस्तिष्क की रक्तवाहिका फट गई हो तो?
रक्तस्राव वाले स्ट्रोक में इलाज अलग होता है। इसमें रक्तचाप को नियंत्रित करने, रक्तस्राव के कारण का उपचार करने और मस्तिष्क पर बढ़ते दबाव को कम करने की जरूरत पड़ सकती है।
कुछ गंभीर मामलों में न्यूरोसर्जरी या रक्तवाहिका के भीतर कैथेटर के जरिए उपचार किया जा सकता है। इसीलिए स्ट्रोक के प्रकार की पहचान करने के लिए अस्पताल में तत्काल जांच बेहद जरूरी है।
क्या स्ट्रोक के बाद मरीज फिर से सामान्य जीवन जी सकता है?
कई मरीजों में उचित उपचार और नियमित पुनर्वास से सुधार संभव है। हालांकि, रिकवरी इस बात पर निर्भर करती है कि स्ट्रोक कितना गंभीर था, मस्तिष्क का कौन-सा हिस्सा प्रभावित हुआ और इलाज कितनी जल्दी मिला।
स्ट्रोक के बाद कुछ लोगों को चलने, हाथ-पैर हिलाने, बोलने या रोजमर्रा के काम करने में परेशानी हो सकती है। ऐसे में फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और अन्य पुनर्वास सेवाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
परिवार का सहयोग, नियमित अभ्यास और डॉक्टर के निर्देशों का पालन मरीज की कार्यक्षमता सुधारने में मदद कर सकता है। पुनर्वास की शुरुआत कब और किस तरह करनी है, यह मरीज की स्थिति के अनुसार चिकित्सा टीम तय करती है।
हाई ब्लड प्रेशर को हल्के में लेना पड़ सकता है भारी
स्ट्रोक के प्रमुख जोखिम कारकों में हाई ब्लड प्रेशर शामिल है। इसके अलावा मधुमेह, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल, हृदय की अनियमित धड़कन, धूम्रपान, अत्यधिक शराब का सेवन, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता भी खतरा बढ़ा सकते हैं।
स्ट्रोक से बचाव के लिए कुछ जरूरी आदतें अपनाई जा सकती हैं:
- नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच कराएं।
- ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें।
- धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें।
- संतुलित भोजन करें और नमक का सेवन सीमित रखें।
- अपनी क्षमता के अनुसार नियमित व्यायाम करें।
- हृदय संबंधी बीमारियों का उचित उपचार कराएं।
- डॉक्टर की सलाह के अनुसार नियमित स्वास्थ्य जांच कराते रहें।
जिन लोगों को पहले स्ट्रोक या TIA हो चुका है, उन्हें दोबारा स्ट्रोक से बचने के लिए निर्धारित दवाएं नियमित रूप से लेनी चाहिए। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद करना या उसकी खुराक बदलना उचित नहीं है।
स्ट्रोक के इलाज में नई तकनीकें क्या बदल रही हैं?
आधुनिक सीटी और एमआरआई इमेजिंग से डॉक्टर मस्तिष्क की रक्तवाहिकाओं में रुकावट और प्रभावित ऊतकों का बेहतर आकलन कर सकते हैं। मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी जैसी तकनीकों ने चुनिंदा मरीजों के उपचार के विकल्प बढ़ाए हैं।
न्यूरोइमेजिंग और इंटरवेंशनल न्यूरोरैडियोलॉजी के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले चिकित्सकों की भूमिका मरीज की इमेजिंग रिपोर्ट समझने, रक्तवाहिका में रुकावट का पता लगाने और उपयुक्त उपचार की योजना बनाने में महत्वपूर्ण हो सकती है। डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ का विभाग इसी विशेषज्ञता से संबंधित है।
इसके साथ ही टेली-स्ट्रोक सेवाएं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित पहचान प्रणाली और विशेष स्ट्रोक सेंटर मरीजों की शीघ्र जांच तथा उपचार के फैसले में मदद कर सकते हैं।
लेकिन आधुनिक तकनीक का लाभ तभी मिल सकता है, जब मरीज समय पर अस्पताल पहुंचे। इसलिए आम लोगों में जागरूकता बढ़ाना और स्ट्रोक के लक्षणों की पहचान करना आज भी सबसे महत्वपूर्ण कदमों में शामिल है।
स्ट्रोक दिवस पर सबसे जरूरी संदेश
स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है। चेहरे का अचानक टेढ़ा होना, एक हाथ में कमजोरी आना या बोलने में परेशानी होना इसके प्रमुख चेतावनी संकेत हैं। ऐसे लक्षणों को मामूली समझकर नजरअंदाज न करें।
समय पर अस्पताल पहुंचने से सही जांच और उपचार जल्द शुरू हो सकता है। इससे मरीज की जान बचाने और गंभीर दिव्यांगता का खतरा कम करने की संभावना बढ़ सकती है।


