स्पेशल रिपोर्ट
जरा कल्पना कीजिए—जिस लोकतंत्र पर हमें सबसे अधिक गर्व है, जिसकी ताकत पर भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में खड़ा है, अगर उसी लोकतंत्र की जड़ें भीतर ही भीतर खोखली हो चुकी हों, तो कैसा लगेगा?भारत में लोकतंत्र कोई सैद्धांतिक अवधारणा नहीं, बल्कि करोड़ों नागरिकों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी, उनकी उम्मीद, उनका अधिकार और सबसे बढ़कर उनका भरोसा है। लेकिन भरोसा तभी टिकता है, जब व्यवस्था ईमानदार हो। और इस ईमानदारी की पहली कसौटी होती है—मतदाता सूची – वही सूची जो तय करती है कि देश का भविष्य कौन लिखेगा।
हम वर्षों से यह मानते आए कि वोट डालना ही लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रमाण है, लेकिन शायद हमने कभी यह गंभीरता से नहीं सोचा कि वोट डाल कौन रहा है। यहीं से SIR (Special Intensive Revision) की जरूरत जन्म लेती है। SIR कोई अचानक गढ़ा गया सरकारी शब्द नहीं, बल्कि उस सच्चाई की स्वीकारोक्ति है जिसे लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया। यह मान लेना कि मतदाता सूची अपने आप शुद्ध रहती है, अपने आप में एक बड़ा भ्रम था।
समय बदला, जनसंख्या बदली, लोग शहरों से गांव और गांवों से शहरों में आए-गए, सीमाएँ बदलीं—लेकिन मतदाता सूचियों में कई बार वही पुराने नाम, वही गलतियाँ और वही खामियाँ बनी रहीं। धीरे-धीरे ये खामियाँ इतनी बड़ी हो गईं कि इनके बीच से पूरा लोकतंत्र रिसने लगा।
मृत व्यक्तियों के नामों पर वोट, एक ही व्यक्ति के कई-कई पंजीकरण, वर्षों पहले स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के नाम पुराने पते पर, और कभी-कभी ऐसे नाम भी, जिनका भारत की नागरिकता से कोई स्पष्ट संबंध ही नहीं—यह सब किसी फिल्मी कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कड़वी हकीकत है।
जब लोकतंत्र में गिनती ही गड़बड़ा जाए, तो फैसले भी गड़बड़ा जाते हैं।
SIR उसी बिंदु पर आकर ठहरता है, जहाँ सिस्टम अब आँख मूंदकर आगे बढ़ने को तैयार नहीं। यह कहता है—अब जाँच होगी, अब सत्यापन होगा, अब यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वोट वही डाले, जिसे इस देश के संविधान ने यह अधिकार दिया है। इसमें न धर्म है, न जाति, न भाषा और न क्षेत्र। इसमें केवल एक पहचान है—भारतीय नागरिक।
जो वैध है, उसके अधिकार SIR कम नहीं करता, बल्कि और मजबूत करता है, क्योंकि जब फर्जी हटते हैं, तो असली वोट की ताकत अपने आप बढ़ जाती है।
स्वाभाविक है कि जब भी सफाई होती है, धूल उड़ती है। SIR के साथ भी यही हुआ। कुछ लोगों को साजिश दिखने लगी, कुछ को लोकतंत्र खतरे में नज़र आने लगा। लेकिन सवाल यह है कि लोकतंत्र खतरे में क्यों महसूस हो रहा है?
इसलिए नहीं कि कोई गरीब या निर्दोष बाहर हो जाएगा, बल्कि इसलिए कि वह राजनीति, जो वर्षों से संख्या के गणित पर टिकी थी, अब सवालों के घेरे में आ गई है। वे वोट बैंक, जो मेहनत से नहीं बल्कि गणना से खड़े किए गए थे, अब असहज महसूस कर रहे हैं।
एक फर्जी वोट देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन असल में वह लोकतंत्र के सीने में धंसी सबसे खतरनाक गोली है। वह नीतियों की दिशा बदल देता है, संसाधनों का रुख मोड़ देता है और असली नागरिक की आवाज़ को कमजोर कर देता है। जब एक ईमानदार नागरिक यह महसूस करता है कि उसका वोट भीड़ में गुम हो गया है, तो वह धीरे-धीरे सिस्टम से कटने लगता है।
SIR उसी टूटते भरोसे को जोड़ने की कोशिश है। यह लोकतंत्र को यह विश्वास लौटाने का प्रयास है कि हर वैध वोट की कीमत है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी!
भारत जैसे देश में यह केवल चुनावी सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। अवैध घुसपैठ कोई भावनात्मक मुद्दा नहीं, बल्कि देश की राजनीति, नीति और भविष्य से जुड़ा एक ठोस तथ्य है। जब कोई ऐसा व्यक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है, जो संविधान के दायरे में आता ही नहीं, तो वह केवल कानून नहीं तोड़ता, बल्कि भारत के निर्णय-तंत्र में सीधा हस्तक्षेप करता है।
SIR उसी हस्तक्षेप को रोकने का प्रयास है—बिना शोर, बिना हथियार, सिर्फ दस्तावेज़ और सत्यापन के ज़रिये।
किसको होगा SIR का लाभ?
इस प्रक्रिया का सबसे बड़ा लाभ किसी सरकार या किसी राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि उस आम नागरिक को होता है, जो वर्षों से नियमों का पालन करता आया है—टैक्स देता है, कानून का सम्मान करता है, लेकिन चुनाव के समय खुद को कमजोर महसूस करता है। जब मतदाता सूची साफ होती है, तो उसका वोट अकेला नहीं रहता; वह गिनती बनता है, वह ताकत बनता है।
युवा भारत के लिए SIR और भी ज़्यादा अहम है। हर साल करोड़ों युवा पहली बार मतदाता बनते हैं—वही युवा जो 2047 के भारत की नींव रखेंगे। अगर उन्हें शुरुआत से ही यह एहसास हो जाए कि सिस्टम गंदा है और उनका वोट बेअसर है, तो लोकतंत्र भीतर से ही खोखला हो जाएगा। SIR उन्हें यह संदेश देता है कि लोकतंत्र सिर्फ विरासत नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।यह मानना ज़रूरी है कि SIR जैसी प्रक्रिया में सावधानी, संवेदनशीलता और जवाबदेही अनिवार्य है। कोई भी वैध नागरिक गलती से बाहर न हो, इसके लिए मजबूत शिकायत और सुधार तंत्र होना चाहिए। लेकिन डर के नाम पर सुधार को रोक देना, बीमारी के डर से इलाज छोड़ देने जैसा है। लोकतंत्र भावनाओं से नहीं, संतुलन और साहस से चलता है।
भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है। विकसित भारत केवल ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं बनेगा, बल्कि मजबूत संस्थाओं, भरोसेमंद चुनावों और स्वच्छ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से बनेगा।
SIR उसी दिशा में उठाया गया एक कठिन, लेकिन जरूरी और ऐतिहासिक कदम है। यह कोई साधारण प्रशासनिक फैसला नहीं—यह लोकतंत्र की सर्जरी है। थोड़ी पीड़ा होगी, थोड़ा शोर होगा, कुछ लोग डर दिखाएँगे, लेकिन अगर यह सर्जरी आज नहीं हुई, तो कल लोकतंत्र आईसीयू में होगा।
सवाल अब यह नहीं कि SIR होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि हम किस भारत को चुनते हैं—सिर्फ वोटिंग वाला भारत या वोट की पवित्रता वाला भारत।और इतिहास हमेशा ऐसे ही फैसलों को याद रखता है।