25 हजार से ज्यादा खरीदारों को इंसाफ की उम्मीद! नोएडा में डिफॉल्टर बिल्डरों की उलटी गिनती शुरू।

✍️ योगेश राणा।

न्यूज़ डायरी टुडे, नोएडा।

Noida Authority: उत्तर प्रदेश के नोएडा में रियल एस्टेट सेक्टर के डिफॉल्टर बिल्डरों पर अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई की तैयारी पूरी हो चुकी है। नोएडा प्राधिकरण और आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की सक्रियता ने उन 15 बिल्डरों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं जिन्होंने न तो सरकारी बकाया चुकाया और न ही खरीदारों को उनके घर सौंपे हैं और नोएडा प्राधिकरण ने उन 15 प्रोजेक्टों की सूची और संबंधित दस्तावेज आर्थिक अपराध शाखा (EOW) को सौंप दिए हैं, जिन्होंने बार-बार चेतावनी के बावजूद वित्तीय अनियमितताएं जारी रखीं। ईओडब्ल्यू ने इन दस्तावेजों की गहन जांच पूरी कर ली है। अब इन बिल्डरों के खिलाफ एफआईआर (FIR), संपत्ति की कुर्की और गिरफ्तारी जैसी सख्त कानूनी कार्रवाई किसी भी समय शुरू हो सकती है।

वित्तीय संकट और खरीदारों का भविष्य

इन 15 बिल्डरों पर नोएडा प्राधिकरण का लगभग 55,000 करोड़ रुपये बकाया है। यह राशि जमीन की किस्तों, ब्याज और दंड (Penalty) के रूप में लंबित है‌ और इन प्रोजेक्टों में करीब 25,000 से 30,000 बायर्स फंसे हुए हैं, जो वर्षों से अपने फ्लैट की रजिस्ट्री या कब्जे का इंतजार कर रहे हैं।

सरकार का क्या होगा अगला कदम!

प्राधिकरण के सूत्रों के अनुसार, जनवरी 2026 में चल रही इस प्रक्रिया के तहत कई अहम क़दम उठाए हैं।यदि बिल्डर समाधान नहीं निकालते, तो प्राधिकरण इन प्रोजेक्ट्स को अपने नियंत्रण में लेकर किसी अन्य डेवलपर के जरिए पूरा करवा सकता है‌ और बिल्डरों और उनके निदेशकों के निजी व कंपनी खातों पर रोक लगाई जा सकती है और जिन जमीनों पर अभी निर्माण शुरू नहीं हुआ है या जो खाली पड़ी हैं, उनका आवंटन रद्द कर प्राधिकरण उन्हें वापस ले सकता है।

अमिताभ कांत पॉलिसी’ और बिल्डरों की लापरवाही!

केंद्र सरकार द्वारा गठित अमिताभ कांत समिति की सिफारिशों को उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष रूप से फंसे हुए प्रोजेक्टों को पुनर्जीवित करने के लिए लागू किया था और बिल्डरों को ‘जीरो पीरियड’ का लाभ दिया गया (कोविड-19 और अदालती स्थगन के दौरान का ब्याज माफ) है और बकाया राशि के भुगतान के लिए आसान किस्तें और समय दिया गया और बकाया चुकाकर रजिस्ट्री का रास्ता साफ किया लेकिन इन 15 बिल्डरों ने इस राहत पैकेज (Policy) का लाभ उठाने में कोई रुचि नहीं दिखाई और न ही बकाया जमा करने के लिए आगे आए। इसी हठधर्मिता के कारण अब प्राधिकरण ने प्रशासनिक के बजाय आपराधिक कार्रवाई (EOW जांच) का रास्ता चुना है।