नोएडा में बाल श्रम का गंभीर सवाल: जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए, वे ढाबों और होटलों में झूठे बर्तन धोने को मजबूर हैं। आखिर जिम्मेदार विभाग कब जागेंगे और इन बच्चों को उनका बचपन कब वापस मिलेगा? पढ़िए पूरी खबर।
News Diary Today | Noida News
नोएडा न्यूज़ | शहर के पॉश इलाकों से लेकर तंग गलियों तक में बने होटल, ढाबे और चाय की दुकानें आज एक ऐसे कड़वे सच की गवाही दे रहे हैं, जिसे देखकर भी हर कोई अनदेखा कर देता है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में रंग-बिरंगी किताबें, बस्ता और खेलने के लिए खिलौने होने चाहिए थे, उस उम्र में उनके छोटे-छोटे नाजुक हाथों में ग्राहकों की छोड़ी हुई झूठी थालियां और बर्तन थमा दिए गए हैं। सुबह के छह बजते ही जहां एक तरफ कुछ बच्चे स्कूल की ड्रेस पहनकर निकलते हैं, वहीं दूसरी तरफ ये नौनिहाल ढाबों पर भट्टी सुलगने से पहले टेबल साफ करते नजर आते हैं। बता दें कि कहने को तो बाल श्रम एक गंभीर और दंडनीय अपराध है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। शहर के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन और मुख्य बाजारों में सरेआम 8 से 14 वर्ष के बच्चे कड़ाके की धूप हो या ठंड, सुबह से देर रात तक हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। झूठी थालियां उठाने और टेबल साफ करने के बदले इन्हें महज चंद रुपये या सिर्फ दो वक्त की रोटी नसीब होती है। इनके बचपन के साथ-साथ इनका भविष्य भी इन होटलों के धुएं में काला होता जा रहा है।
श्रम विभाग की रहस्यमयी चुप्पी?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा और हैरान करने वाला सवाल श्रम विभाग की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। कानूनन बाल श्रम को रोकने और औचक निरीक्षण करने की जिम्मेदारी जिस विभाग के कंधों पर है, वह पूरी तरह से मौन साधे बैठा है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि श्रम विभाग के अधिकारी एसी कमरों से बाहर नहीं निकलते। कभी-कभार यदि कोई जांच या छापेमारी होती भी है, तो वह महज एक औपचारिकता और कागजी खानापूर्ति बनकर रह जाती है। दुकानदारों को पहले ही भनक लग जाती है, जिसके कारण बच्चे मौके से हटा दिए जाते हैं।
जिम्मेदार कौन?
इस बदहाली के लिए केवल गरीबी ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि समाज की उदासीनता और प्रशासनिक तंत्र की नाकामी भी उतनी ही बड़ी वजह है। जब तक नियमों को सख्ती से लागू नहीं किया जाएगा और होटलों व ढाबों पर बाल श्रम कराने वाले मालिकों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई (जैसे भारी जुर्माना और जेल) नहीं होगी, तब तक इन मासूमों के हाथों से झूठी थालियां हटाकर किताबें नहीं थमाई जा सकेंगी। अब देखना यह है कि इस गंभीर रिपोर्ट के बाद क्या श्रम विभाग की नींद टूटती है या मासूमों का बचपन यूं ही झूठे बर्तनों के बीच दम तोड़ता रहेगा।