UP News: सड़क हादसे में घायल की जान बचाना सबसे पहली प्राथमिकता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने साफ कहा है कि पुलिस कार्रवाई या MLC की औपचारिकताओं के नाम पर घायल का इलाज नहीं रोका जा सकता। कोर्ट ने सरकार से नियमों के जमीनी पालन और निगरानी तंत्र का भी जवाब मांगा है।
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यूपी हाईकोर्ट | इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सड़क हादसों में घायल होने वाले मरीजों के इलाज को लेकर एक बेहद संवेदनशील और युगांतकारी आदेश दिया है। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि पुलिस कार्रवाई या मेडिको-लीगल (MLC) औपचारिकताओं के नाम पर किसी भी घायल का इलाज नहीं रोका जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे अस्पताल सरकारी हो या निजी, आपातकालीन स्थिति में तुरंत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराकर मरीज की जान बचाना ही डॉक्टरों का प्राथमिक और नैतिक दायित्व है। बता दें कि यह ऐतिहासिक आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने अंजू प्रकाश श्रीवास्तव द्वारा वर्ष 2000 में दायर की गई एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए पारित किया। वहीं इस मामले में सबसे हैरान करने वाला पहलू न्यायिक और प्रशासनिक देरी रही। राज्य सरकार ने साल 2000 में दाखिल इस याचिका का 25 वर्षों तक कोई जवाब (Counter-Affidavit) दाखिल नहीं किया था। इस घोर लापरवाही और उदासीनता पर कड़ा रुख अपनाते हुए हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹25,000 का हर्जाना (कॉस्ट) लगाया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि यह जुर्माना राशि सीधे याचिकाकर्ता को दी जाए। इसके साथ ही, अदालत ने राज्य सरकार को 10 दिनों के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का अंतिम निर्देश दिया है।
सेव लाइफ फाउंडेशन’ और ‘गुड समैरिटन’ नियमों की याद दिलाई!
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट के 2016 के ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ (Savelife Foundation) फैसले और केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा 12 मई 2015 को जारी की गई ‘गुड समैरिटन गाइडलाइंस’ (Good Samaritan Guidelines) का हवाला दिया गया। इन नियमों के तहत आपातकालीन स्थिति में घायल को इलाज देने से मना करना डॉक्टरों के लिए पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) माना जाएगा, जिसके लिए उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है।सभी सरकारी और निजी अस्पतालों के प्रवेश द्वार पर हिंदी, अंग्रेजी और स्थानीय भाषा में एक चार्टर/बोर्ड प्रदर्शित करना अनिवार्य है। इस पर साफ लिखा होना चाहिए कि घायल को अस्पताल लाने वाले किसी भी मददगार (नेक फरिश्ते/बाइस्टैंडर) को रोका नहीं जाएगा और न ही उससे इलाज के पैसे जमा करने को कहा जाएगा।
हाईकोर्ट ने मांगा निगरानी तंत्र का ब्योरा!
हाईकोर्ट ने सिर्फ कागजी नियमों पर असंतोष जताते हुए सरकार से पूछा है कि इन नियमों को जमीन पर लागू करने के लिए क्या निगरानी (Monitoring) व्यवस्था बनाई गई है? कोर्ट ने हलफनामे में निम्नलिखित जानकारियां मांगी हैं कि अस्पतालों के औचक निरीक्षण (Inspections) का क्या सिस्टम है?।नियमों के उल्लंघन की शिकायतें दर्ज करने और उनके निवारण (Redressal) के लिए क्या तंत्र मौजूद है?।अब तक जिला-वार कितनी शिकायतें मिली हैं और उन पर क्या कार्रवाई हुई है?।इस बेहद महत्वपूर्ण मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को नियत की गई है, जिसमें सरकार को यह पूरा खाका कोर्ट के सामने पेश करना होगा।