इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोमांस बरामदगी से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि वाहन में गोमांस मिलने और मालिक के उसी वाहन में मौजूद होने की स्थिति में महज अज्ञानता का दावा वाहन जब्ती से बचने का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने वाहन मालिक की याचिका खारिज कर दी।
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प्रयागराज | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम, 1955 के तहत एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिसमें कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वाहन में गोमांस पाया जाता है और उसका मालिक भी उसी वाहन में मौजूद था, तो वह ‘अज्ञानता’ या ‘जानकारी न होने’ की दलील देकर अपने वाहन की जब्ती (Confiscation) से नहीं बच सकता। बता दें कि यह मामला एक ऑटो वाहन से जुड़ा है, जिसे 18 मार्च 2025 को किराए पर यात्रियों को ले जाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था. चेकिंग के दौरान उस वाहन से 80 किलोग्राम गोमांस (Beef) बरामद किया गया था. पुलिस ने मौके से वाहन के मालिक को भी गिरफ्तार किया था. फोरेंसिक साइंस लैब (FSL) की जांच रिपोर्ट में भी इस बात की आधिकारिक पुष्टि हुई कि बरामद मांस वास्तव में गोमांस ही था।वाहन मालिक ने अधिकारियों द्वारा गाड़ी जब्त किए जाने के आदेश (दिनांक 30 जून 2025 और 27 अप्रैल 2026) को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. याचिकाकर्ता (मालिक) ने कोर्ट में तर्क दिए कि उसने आजीविका कमाने के लिए यह ऑटो खरीदा था और इसके लिए एक ड्राइवर रखा था।वाहन को तीन यात्रियों ने किराए पर लिया था, जो उसकी सहमति और जानकारी के बिना उसमें मांस ले जा रहे थे।उसकी कोई आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) या मिलीभगत नहीं थी, इसलिए वाहन को जब्त करना गलत है।
कोर्ट की टिप्पणियां और फैसला!
हाईकोर्ट ने केस डायरी और सबूतों का गहन अध्ययन करने के बाद याचिकाकर्ता के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया. कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इन बिंदुओं को रेखांकित किया कि कोर्ट ने पाया कि जब वाहन से 80 किलो गोमांस बरामद किया गया, तो वाहन का मालिक स्वयं भी उसी गाड़ी में यात्रा कर रहा था।मालिक का यह दावा कि मांस तीन किराएदारों का था, किसी भी ठोस सबूत से समर्थित नहीं था. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता उन कथित किराएदारों से पूछताछ कराकर अपनी बात साबित कर सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया।उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम की धारा 5-ए(10) के तहत, गोमांस की पुष्टि होने के बाद वाहन जब्ती का कानूनी अनुमान पूरी तरह वैध है।अदालत ने माना कि नीचे के प्राधिकारियों (अधिकारियों) द्वारा वाहन को जब्त करने का निर्णय बिल्कुल सही था और इसमें कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी. इस टिप्पणी के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाहन मालिक की रिट याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।