आकृति चौधरी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के सख्त फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करने की तैयारी में है। NSA की कार्रवाई, अधिकारियों की भूमिका और 5 लाख मुआवजे के आदेश ने इस मामले को संवैधानिक अधिकार बनाम प्रशासनिक शक्ति की बड़ी कानूनी बहस बना दिया है।
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Supreme Court: उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में आकृति चौधरी पर लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को न सिर्फ रद्द कर दिया था, बल्कि नौकरशाही के रवैये पर बेहद तीखी टिप्पणियां करते हुए अधिकारियों की सैलरी से मुआवजा देने का एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया था। बता दें कि यह मामला अप्रैल 2026 का है, जब उत्तर प्रदेश के नोएडा (गौतम बुद्ध नगर) के इंडस्ट्रियल इलाकों में मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर एक बड़ा आंदोलन किया था। इस आंदोलन के दौरान कुछ जगहों पर हिंसा और गाड़ियों में आगजनी की घटनाएं भी सामने आईं।दिल्ली यूनिवर्सिटी की 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और ‘मज़दूर बिगुल’ अखबार की रिपोर्टर आकृति चौधरी इस आंदोलन की रिपोर्टिंग करने और मजदूरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के सिलसिले में वहां मौजूद थीं। यूपी पुलिस ने आकृति चौधरी को मजदूरों को भड़काने और दंगा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया और बाद में उन पर कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया। इसके अलावा उन पर कुल 11 मुकदमे दर्ज किए गए।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का ऐतिहासिक और कड़ा फैसला!
इस साल सितंबर की शुरुआत में, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अचल सचदेव और जस्टिस अतुल श्रीधरन की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए यूपी सरकार और प्रशासन को तगड़ा झटका दिया।हाई कोर्ट ने अपने फैसले में जो कहा, उसने पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में हलचल मचा दी।कोर्ट ने आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत को पूरी तरह गलत और अवैध पाया। कोर्ट ने छात्रा को ₹5 लाख का मुआवजा देने का आदेश दिया और साफ किया कि यह पैसा सरकारी खजाने से नहीं, बल्कि गौतम बुद्ध नगर की जिला अधिकारी (DM) मेधा रूपम और अन्य जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के वेतन से काटा जाएगा।कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर नौकरशाही का ऐसा ही तानाशाही और मनमाना रवैया जारी रहा, तो उत्तर प्रदेश एक ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ (एक ऐसा क्रूर समाज जहां नागरिकों की कोई आजादी नहीं होती) में बदल जाएगा। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी जनता के सेवक हैं, ब्रिटिश राज के दमनकारी नुमाइंदे नहीं।कोर्ट ने जांच में पाया कि प्रशासन ने आकृति की गिरफ्तारी के बाद बैक-डेट या गलत तरीके से कागजात तैयार किए, जो महज एक ‘दिखावटी कागजी कार्रवाई’ और रिकॉर्ड में हेराफेरी थी। सरकार कोर्ट में ऐसा कोई वीडियो या चैट का सबूत नहीं दे पाई जिससे साबित हो कि आकृति ने हिंसा भड़काई थी।
अब सुप्रीम कोर्ट का रुख क्यों कर रही है सरकार?
हाई कोर्ट के इस फैसले से न सिर्फ अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड पर दाग लगा है, बल्कि प्रशासनिक शक्तियों और एनएसए जैसे कड़े कानून के इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करने जा रही है।सरकार का मानना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा समय पर लिए गए फैसलों को इस तरह हतोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। सरकार शीर्ष अदालत के सामने उन इनपुट्स और परिस्थितियों को रखने की कोशिश करेगी जिसके आधार पर नोएडा जिला प्रशासन ने यह कदम उठाया था।यह मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत में जा रहा है, जहां एक तरफ अभिव्यक्ति की आजादी और संवैधानिक अधिकार होंगे, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक अधिकारियों की कार्रवाई और कानून-व्यवस्था का बचाव।
आकृति चौधरी केस: सुप्रीम कोर्ट के नामी वकील सौरभ श्रीवास्तव का सूक्ष्म विश्लेषण— आखिर क्यों पलटना मुश्किल है हाई कोर्ट का फैसला?
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता सौरभ त्रिवेदी के अनुसार, आकृति चौधरी मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला देश की न्यायपालिका में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर है।अधिवक्ता सौरभ त्रिवेदी का मानना है कि अधिकारियों की सैलरी से ₹5 लाख का मुआवजा वसूलने का आदेश सबसे क्रांतिकारी कदम है।उनके अनुसार,यह फैसला अधिकारियों की निरंकुशता पर सीधी चोट है। अब तक अधिकारी गलत गिरफ्तारियां करके टैक्सपेयर्स के पैसे से मुआवजा चुकाते थे, लेकिन अपनी जेब से पैसे कटने के डर से अब वे NSA जैसे कड़े कानून का दुरुपयोग करने से पहले सौ बार सोचेंगे। सौरभ त्रिवेदी के विश्लेषण के मुताबिक, हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी सबसे ऊपर है। पुलिस सिर्फ अंदेशे या अपनी मर्जी से किसी सामाजिक कार्यकर्ता या पत्रकार को जेल में नहीं डाल सकती। कोर्ट ने यह साफ किया कि ‘मजदूरों की आवाज उठाना’ या ‘असंतोष व्यक्त करना’ देश की सुरक्षा के लिए खतरा या राष्ट्रद्रोह नहीं है।अधिवक्ता का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार का टिकना बेहद मुश्किल होगा। इसका मुख्य कारण यह है कि पुलिस ने आकृति की गिरफ्तारी और रिमांड की तारीखों में भारी हेरफेर (बैक-डेटिंग) की थी। कानूनन, अगर प्रक्रियात्मक त्रुटि (Procedural Error) पाई जाती है, तो सुप्रीम कोर्ट कभी भी NSA को वैध नहीं ठहराता।सौरभ श्रीवास्तव के अनुसार, जब यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर करेगी, तो उच्चतम न्यायालय मुख्य रूप से दो बातें कर सकता है।आकृति चौधरी की रिहाई और उन पर से NSA हटाने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल नहीं बदलेगा, क्योंकि सरकार के पास हिंसा भड़काने का कोई ठोस डिजिटल या वीडियो सबूत नहीं है।अधिकारियों के मनोबल और प्रशासनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट शायद ‘सैलरी से मुआवजा काटने’ वाले आदेश पर रोक लगा दे या मुआवजे की राशि सरकारी खजाने से देने को कह दे।संक्षेप में कहें तो,अधिवक्ता त्रिवेदी श्रीवास्तव के मुताबिक यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी सरकार के लिए एक बड़ी कानूनी शिकस्त साबित होने वाला है, जिसने नागरिक अधिकारों की सुरक्षा का एक नया पैमाना तय कर दिया है।