तारीख पर तारीख ने उपभोक्ताओं की मुश्किल बढ़ा दी है। देशभर की कंज्यूमर अदालतों में करीब 5.93 लाख मामले लंबित हैं। महाराष्ट्र में तो एक उपभोक्ता केस 32 साल से फैसले का इंतजार कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए खाली पदों और भारी पेंडेंसी पर राज्यों से जवाब मांगा है।
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Supreme court | उपभोक्ताओं को बाजार के धोखेबाजों और शोषण से बचाने के लिए साल 1986 में जिस ऐतिहासिक उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) की नींव रखी गई थी, आज वह खुद ‘तारीख पे तारीख’ के जाल में फंसकर हांफ रहा है। सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट के बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने उपभोक्ता अदालतों के कामकाज पर गहरी चिंता जताई है। बता दें कि रिपोर्ट के मुताबिक, देश की कंज्यूमर अदालतों में इस समय लगभग 6 लाख (5.93 लाख) मामले पेंडिंग हैं। सबसे हैरान करने वाला मामला महाराष्ट्र का है, जहां एक पीड़ित पिछले 32 सालों से न्याय मिलने की आस में बैठा है, लेकिन राज्य उपभोक्ता आयोग के सामने लंबित इस सबसे पुराने केस का फैसला आज तक नहीं हो सका है।त्वरित और आसान न्याय (Speedy Justice) के उद्देश्य से बनी इन अदालतों की बदहाली देखकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सभी राज्य सरकारों से खाली पदों को तुरंत भरने और इस भारी-भरकम बैकलॉग को खत्म करने के लिए विस्तृत रोडमैप के साथ जवाब तलब किया है। यदि सरकारें उपभोक्ता अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हुईं, तो ‘जागो ग्राहक जागो’ का यह नारा सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाएगा।
पेंडेंसी का पूरा गणित: कहां कितने केस अटके हैं?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता विवाद निवारण प्रणाली के तीनों स्तरों पर कुल 5,93,109 मामले लंबित हैं।
1-राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग (NCDRC): 16,915 केस
2-राज्य उपभोक्ता आयोग: 1.27 लाख (1,27,507) केस
3-जिला उपभोक्ता फोरम: 4.48 लाख (4,48,687) केस
इंसाफ में इस महा-देरी की असली वजह क्या है?
अदालतों में मुकदमों का यह पहाड़ अचानक खड़ा नहीं हुआ है। एमिटी क्यूरी (न्यायालय मित्र) की रिपोर्ट ने इसके पीछे की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है।देश भर के राज्य और जिला उपभोक्ता आयोगों में प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) और सदस्यों के 864 पद खाली पड़े हैं।देश के 10 राज्यों के उपभोक्ता आयोग बिना किसी फुल-टाइम प्रेसिडेंट के काम कर रहे हैं।खाली पदों की वजह से कोर्ट की बेंचें नहीं बैठ पा रही हैं। इसके अलावा, धीमी सुनवाई और फैसलों को ऑनलाइन अपलोड करने में होने वाली अत्यधिक देरी ने इस संकट को और बड़ा बना दिया है।