सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। CJI ने सवाल उठाया कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगाई थी, तो फिर मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी कैसे किया? कोर्ट ने मामले में स्पष्टीकरण मांगा है।
Supreme Court | सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर (ग्रेटर नोएडा) के एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट के रवैये पर सख्त नाराजगी जताई है। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने साफ तौर पर कहा कि जब सर्वोच्च अदालत का स्पष्ट आदेश था कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले किसी भी छात्र पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी, तो फिर मजिस्ट्रेट ने आदेश का उल्लंघन करते हुए छात्र को कारण बताओ नोटिस कैसे जारी कर दिया? कोर्ट ने साफ किया कि भले ही प्रशासन ने चौतरफा घिरने के बाद नोटिस वापस ले लिया हो, लेकिन अदालत इस मनमाने रवैये को ऐसे ही नहीं जाने देगी और संबंधित मजिस्ट्रेट से आधिकारिक तौर पर जवाब तलब करेगी। बता दें कि गौतम बुद्ध यूनिवर्सिटी (GBU) में BA-LLB का छात्र है अक्षत त्रिपाठी। पुलिस का दावा था कि अक्षत दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक राजनीतिक दल (CJP) द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में शामिल हुआ और अन्य छात्रों को विरोधी भ्रामक बातों” के लिए उकसा रहा था।एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट III, ग्रेटर नोएडा द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत नोटिस जारी कर छात्र से ₹5 लाख का पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही राशि की दो जमानतें भरने को कहा गया था ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे।अक्षत त्रिपाठी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया। उसने कहा कि यूनिवर्सिटी महीनों से बंद थी और उसने सिर्फ शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
वरिष्ठ अधिवक्ता बिश्वजीत भट्टाचार्य ने मामले को पीठ के सामने रखते हुए कहा कि प्रशासन हमारे युवाओं और छात्रों पर “प्रयोग” कर रहा है, जो कि सीधे तौर पर 1 सितंबर को आए SC के आदेश का उल्लंघन है।CJI ने बेहद कड़े शब्दों में कहा, “एक मजिस्ट्रेट ऐसा करने की हिम्मत कैसे कर सकता है? हमने बिल्कुल साफ कहा था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया जाएगा। कोई भी हमारे आदेशों का उल्लंघन नहीं कर सकता।”कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील को निर्देश दिया है कि वे इस पूरे मामले और मजिस्ट्रेट के नोटिस को आधिकारिक रिट याचिका के तौर पर रिकॉर्ड पर लाएं। कोर्ट प्रशासन से अवमानना (Contempt) को लेकर लिखित स्पष्टीकरण मांगेगा।
नोटिस वापसी के बाद भी क्यों फंसा पेंच?
सोशल मीडिया पर नोटिस की कॉपी वायरल होने और छात्र संगठनों (जैसे SFI) के कड़े विरोध के बाद यूपी पुलिस और प्रशासन ने बैकफुट पर आते ही अगले ही दिन नोटिस को रद्द (Revoke) कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि एक बार अदालत का सुरक्षा कवच मिलने के बाद किसी भी प्रशासनिक अधिकारी द्वारा ऐसी कार्रवाई करना प्रथम दृष्ट्या न्यायालय की अवमानना है, इसलिए इस मामले में जवाबदेही तय होना बेहद जरूरी है।