नोएडा फ्लैट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम, असली हकदारों की पहचान के लिए पूर्व जज की अध्यक्षता में बनी स्वतंत्र समिति

नोएडा के करीब 30 साल पुराने फ्लैट विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने पूर्व जज जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित कर मूल आवंटियों और बाद के खरीदारों के दावों की जांच का जिम्मा सौंपा है। अब दस्तावेजों की जांच के बाद तय होगा कि फ्लैटों पर वास्तविक हकदार कौन हैं।
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नोएडा न्यूज़ | नोएडा के बहुचर्चित और करीब तीन दशक पुराने फ्लैट आवंटन विवाद को सुलझाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना की अध्यक्षता में एक-सदस्यीय स्वतंत्र और उच्चाधिकार प्राप्त समिति गठित की है। समिति का मुख्य काम विवादित फ्लैटों पर दावेदारी करने वाले मूल सदस्यों और बाद में फ्लैट खरीदने वाले लोगों के दावों की जांच कर वास्तविक हकदारों की पहचान करना है।
यह मामला केंद्रीय कर्मचारी सहकारी गृह निर्माण समिति (Kendriya Karamchari Sahkari Grih Nirman Samiti) से जुड़ा है। वर्षों से चल रहे इस विवाद में नोएडा प्राधिकरण, सोसाइटी के मूल आवंटी और बाद के खरीदारों के दावे आमने-सामने रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पहले दिए गए निर्देशों के बावजूद दावों का सत्यापन और मामले का समाधान आगे नहीं बढ़ सका है।
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था अहम आदेश
इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2022 में नोएडा प्राधिकरण को सोसाइटी के 844 चिन्हित सदस्यों को मल्टी-स्टोरी फ्लैट उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था। साथ ही 133 Subsequent Purchasers, यानी बाद में फ्लैट खरीदने वाले लोगों के दावों की अलग से जांच करने को कहा गया था।
हालांकि, इसके बाद हुई कार्यवाही में मूल सदस्यों और बाद के खरीदारों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए। बाद की कार्यवाही में मूल सदस्यों की संख्या 863 और बाद के खरीदारों की संख्या 120 बताई गई। आंकड़ों और पात्रता को लेकर बने इस गतिरोध के कारण सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश को पूरी तरह लागू करने में परेशानी आती रही।
मूल आवंटी बनाम बाद के खरीदार—क्या है विवाद?
विवाद का एक प्रमुख पहलू यह है कि मूल आवंटियों को सोसाइटी के माध्यम से फ्लैट मिलने थे, जबकि कुछ लोगों ने बाद में इन आवंटनों से जुड़े अधिकार खरीदे।
नोएडा प्राधिकरण ने बाद के खरीदारों को मान्यता देने पर आपत्ति जताई। प्राधिकरण का तर्क रहा कि मूल आवंटन में हस्तांतरण को लेकर प्रतिबंध थे और 1998 में मूल आवंटन रद्द किए गए थे।
दूसरी ओर, सोसाइटी का पक्ष रहा कि उसने बाद के हस्तांतरण से जुड़े आवेदन नोएडा प्राधिकरण के समक्ष रखे थे, लेकिन उन पर आवश्यक कार्रवाई नहीं हुई। सोसाइटी ने यह भी कहा कि मूल आवंटियों को जारी किए गए रिफंड चेक भी भुनाए नहीं गए थे।
जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना की समिति क्या करेगी?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक-सदस्यीय समिति को मामले की स्वतंत्र जांच का अधिकार दिया गया है। जस्टिस सुधीर कुमार सक्सेना संबंधित रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच करेंगे तथा जरूरत के अनुसार दावेदारों की बात भी सुन सकते हैं।
समिति अपनी प्रक्रिया खुद निर्धारित कर सकती है और आवश्यक दस्तावेज मंगा सकती है। इसका उद्देश्य यह तय करना है कि कौन-कौन से सदस्य और दावेदार सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्देशों के तहत फ्लैट पाने के पात्र हैं।
8 सप्ताह में देनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने समिति को अपनी रिपोर्ट आठ सप्ताह के भीतर सौंपने का निर्देश दिया है। साथ ही नोएडा प्राधिकरण को समिति को आवश्यक सचिवीय और लॉजिस्टिक सहयोग उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।
कोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण, सोसाइटी और सभी संबंधित दावेदारों से समिति के साथ पूरा सहयोग करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर 2026 को होगी।
तीन दशक पुराने विवाद के समाधान की उम्मीद
नोएडा के इस आवास विवाद की जड़ें 1990 के दशक के आवंटन से जुड़ी हैं। वर्षों से चल रही कानूनी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में मूल आवंटी और बाद के खरीदार अपने दावों के अंतिम निपटारे का इंतजार कर रहे हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतंत्र समिति गठित किए जाने से मामले में दावेदारों की पात्रता और दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया को एक स्पष्ट दिशा मिलने की संभावना है। हालांकि, अंतिम रूप से कौन पात्र होगा और फ्लैटों पर किसका अधिकार बनेगा, यह समिति की जांच और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट के समक्ष होने वाली कार्यवाही पर निर्भर करेगा।

