24 साल… अनगिनत तारीखें… और एक बेटी का अटूट विश्वास। पिता की हत्या के बाद हार मानने के बजाय न्याय की लड़ाई लड़ने वाली आईपीएस लक्ष्मी सिंह ने आखिरकार हत्यारों को उम्रकैद दिलाकर इतिहास रच दिया।
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लखनऊ। न्याय की राह अक्सर लंबी और कठिन होती है, लेकिन जब किसी बेटी का संकल्प अडिग हो और कानून पर उसका विश्वास अटूट हो, तब वर्षों पुराना अपराध भी अपने अंजाम तक पहुंचता है। यह कहानी है उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी लक्ष्मी सिंह की, जिन्होंने अपने पिता, लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्रदेव सिंह की हत्या के बाद लगभग 24 वर्षों तक न्याय की लड़ाई लड़ी और आखिरकार दोषियों को सजा दिलाकर यह साबित कर दिया कि कानून की पकड़ से अपराधी हमेशा के लिए बच नहीं सकते।
8 अगस्त 2002 : जब दिनदहाड़े हुई थी सनसनीखेज हत्या
8 अगस्त 2002 की शाम करीब 4 से 4:30 बजे वरिष्ठ अधिवक्ता एवं लखनऊ बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष इंद्रदेव सिंह कचहरी का काम समाप्त कर अपने स्कूटर से घर लौट रहे थे। जैसे ही वह कलेक्ट्रेट और कैसरबाग टेलीफोन एक्सचेंज के पीछे स्थित संकरी गली में पहुंचे, पहले से घात लगाए बैठे बदमाशों ने उन पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं।
एक गोली उनकी गर्दन को चीरते हुए निकल गई। गंभीर रूप से घायल इंद्रदेव सिंह सड़क पर गिर पड़े और मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। राजधानी लखनऊ के बीचों-बीच हुई इस दुस्साहसिक वारदात ने पूरे प्रदेश की न्याय व्यवस्था और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे।
3 करोड़ की संपत्ति बनी हत्या की वजह
जांच के दौरान सामने आया कि यह हत्या किसी अचानक हुए विवाद का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक सुनियोजित साजिश थी। सीतापुर रोड स्थित लगभग 3 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति के विवाद को इस हत्याकांड की मुख्य वजह माना गया।
सीबीआई जांच में यह स्थापित हुआ कि ब्रजेश यादव उर्फ मुन्ना स्कूटर चला रहा था, जबकि उसके पीछे बैठे पेशेवर शूटर विक्रम यादव उर्फ कालिया ने बेहद करीब से इंद्रदेव सिंह पर गोलियां चलाई थीं। पन्ना सिंह भी इस पूरी साजिश में बराबर का सहभागी था।
यहीं से शुरू हुआ एक बेटी का संघर्ष
जब यह घटना हुई, उस समय लक्ष्मी सिंह वर्ष 2000 बैच की युवा आईपीएस अधिकारी थीं और पश्चिम बंगाल कैडर में अपनी सेवाएं दे रही थीं।
पिता की अचानक हुई हत्या ने पूरे परिवार को झकझोर दिया, लेकिन लक्ष्मी सिंह ने हार नहीं मानी। उन्होंने सिर्फ एक बेटी के रूप में नहीं, बल्कि कानून में विश्वास रखने वाली अधिकारी के रूप में न्याय की लड़ाई का जिम्मा उठाया।
स्थानीय पुलिस की शुरुआती जांच को लेकर उठे सवालों और अधिवक्ताओं के भारी विरोध के बीच लक्ष्मी सिंह ने राज्य सरकार के समक्ष मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की। उनके लगातार प्रयासों और दृढ़ संकल्प के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की सिफारिश की।
22 वर्षों तक हर तारीख पर रही पैनी नजर
वर्ष 2004 में सीबीआई ने मामले में चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद शुरू हुआ लंबा कानूनी संघर्ष, जो दो दशक से अधिक समय तक चला।
बताया जाता है कि लक्ष्मी सिंह ने मुकदमे की हर सुनवाई, हर गवाही और हर कानूनी दलील पर लगातार नजर बनाए रखी। उन्होंने निजी पीड़ा को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और यह सुनिश्चित किया कि दोषियों को कानून के अनुसार सजा मिले।
आखिरकार मिला न्याय
करीब 24 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद विशेष सीबीआई अदालत के न्यायाधीश वायु नंदन मिश्रा ने मामले में फैसला सुनाते हुए तीनों जीवित बचे आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि आरोपियों से वसूले जाने वाले जुर्माने की कुल राशि का 80 प्रतिशत हिस्सा पीड़ित परिवार को मुआवजे के रूप में दिया जाएगा।
हालांकि मुकदमे के दौरान ही इस साजिश में शामिल तीन अन्य आरोपी—मन्ना लाल गुप्ता, वेद प्रकाश उर्फ नेता और छोटेलाल उर्फ छोटू—की मृत्यु हो गई, जिसके चलते उनके विरुद्ध न्यायालयीन कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
एक बेटी का संकल्प बना न्याय की मिसाल
यह फैसला केवल एक हत्या के मुकदमे का अंत नहीं, बल्कि उस बेटी के अडिग विश्वास की जीत है जिसने अपने पिता को खोने के बावजूद न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी।
आज उत्तर प्रदेश की सबसे सख्त और प्रभावशाली पुलिस अधिकारियों में गिनी जाने वाली आईपीएस लक्ष्मी सिंह ने यह साबित कर दिया कि वर्दी का फर्ज निभाने के साथ-साथ एक बेटी का कर्तव्य भी पूरी निष्ठा से निभाया जा सकता है।
कानून की इस लंबी लड़ाई से उन्होंने साबित किया है कि न्याय में भले देर हो जाए, लेकिन यदि हौसला अडिग हो और कानून पर भरोसा कायम रहे, तो अपराधियों को उनके अपराध की सजा अवश्य मिलती है।
