October 23, 2026

हम हाईकोर्ट के जज हैं, जमीनी हकीकत जानते हैं” : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने UP पुलिस की जांच और दावों की खोली पोल

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ कन्विक्शन रेट के आंकड़े बताने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती। DGP की मौजूदगी में कोर्ट ने खराब जांच, CCTV रिकॉर्ड और जमानत मामलों में देरी को लेकर कड़ी नाराजगी जताई।

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UP High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की जांच प्रणाली पर तीखी टिप्पणी करते हुए डीजीपी को फटकार लगाई है और कागजी आंकड़ों के मुकाबले जमीनी हकीकत का हवाला दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) के दावों के बावजूद अदालतों में खराब जांच के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में मंगलवार को उस समय बेहद असहज स्थिति पैदा हो गई जब उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) की व्यक्तिगत पेशी के दौरान अदालत ने राज्य की पुलिस जांच प्रणाली की धज्जियां उड़ा दीं। पुलिसिया ढुलमुल रवैये से नाराज जस्टिस समीर जैन की पीठ ने यूपी पुलिस की कार्यशैली, झूठे हलफनामों और अदालती आदेशों की तामील में होने वाली देरी को लेकर बेहद तल्ख और सख्त टिप्पणियां कीं।सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस समीर जैन ने DGP से सीधा सवाल किया कि पुलिस की तरफ से जरूरी कानूनी निर्देश और केस डायरी समय पर कोर्ट तक पहुंचे, इसके लिए मुख्यालय स्तर पर क्या कदम उठाए गए हैं?।इस पर खुद का बचाव करते हुए डीजीपी ने अदालत को उत्तर प्रदेश पुलिस के ऊंचे दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) के आंकड़े गिनाने शुरू कर दिए। डीजीपी के इस तर्क पर कोर्ट ने उन्हें तुरंत टोकते हुए कहा आप हमें conviction rate के आंकड़े मत बताइए। हमारे सामने रोज खराब तरीके से की गई जांच (Poor Investigation) के ढेरों मामले आते हैं। इन कागजी आंकड़ों का क्या मतलब है? हम हाईकोर्ट के जज हैं और पुलिस की जमीनी हकीकत को बहुत अच्छी तरह जानते हैं।”

CCTV फुटेज और गायब रिकॉर्ड पर गंभीर सवाल!

अदालत ने पुलिस द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामों (Affidavits) की विश्वसनीयता पर भी बड़े सवाल खड़े किए। कोर्ट ने कहा कि कई संवेदनशील मामलों में पुलिस हलफनामे में दावा करती है कि घटनास्थल या थाने की CCTV फुटेज और सारे रिकॉर्ड सुरक्षित हैं। लेकिन, जब कोर्ट असलियत जानने के लिए रिकॉर्ड तलब करता है, तो फुटेज गायब मिलती है या तकनीकी खराबी का बहाना बना दिया जाता है। कोर्ट ने इसे न्याय प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ बताया।व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) यानी जमानत और अग्रिम जमानत से जुड़े मामलों में पुलिस की तरफ से निर्देश आने में होने वाली देरी पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई।जस्टिस जैन ने याद दिलाया कि पहले पुलिस निर्देश लेने के लिए 10 दिन का समय मांगती थी।अब देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी से जुड़े मामले में पुलिस को निर्देश देने के लिए 3 दिन का समय पर्याप्त है। इसके बावजूद यूपी पुलिस हफ्तों लगा देती है, जिससे आरोपी बिना वजह जेल में बंद रहते हैं।

“समस्याएं हम बताएंगे, समाधान आप निकालिए”!

कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए डीजीपी ने अदालत को भरोसा दिलाया कि पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और इसके लिए विशेष कमेटियां (समितियां) भी गठित की गई हैं।इस पर जस्टिस समीर जैन ने मामले को बेहद सकारात्मक लेकिन कड़े लहजे में समाप्त करते हुए कहा, “आप सभी सक्षम और वरिष्ठ अधिकारी हैं। हमारा काम आपको व्यवस्था की कमियां और समस्याएं बताना है, और एक सक्षम अधिकारी के रूप में उन समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकालना आपका काम है।”

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