हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘चमार’ शब्द बोलना मात्र अपराध नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल ‘चमार’ जैसे जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल होना अपने आप में अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने आरोपी को जारी समन आदेश रद्द करते हुए कहा कि अपराध के लिए आवश्यक तत्व और स्पष्ट मंशा प्रथम दृष्टया सामने आना जरूरी है।

नोएडा न्यूज़ | इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/ST (SC/ST) एक्ट को लेकर एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि केवल किसी जाति का नाम लेना या जातिसूचक शब्द बोलना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। बता दें कि हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा आरोपी को जारी किए गए समन (Summon) आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया। कोर्ट ने पाया कि मामले में अपराध के बुनियादी तत्व मौजूद नहीं थे।कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत केस चलाने के लिए यह साबित होना चाहिए कि आरोपी का इरादा पीड़ित को उसकी जाति के कारण सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का था।बिना किसी दुर्भावना या स्पष्ट इरादे के केवल शब्द बोल देना इस कानून के दायरे में नहीं आता।

चमार’ शब्द के इस्तेमाल पर टिप्पणी!

अदालत ने स्पष्ट किया कि बातचीत में ‘चमार’ शब्द का आना ही अपने आप में यह तय नहीं करता कि अपराध हुआ है।इसके लिए ठोस और मजबूत सबूतों का होना अनिवार्य है।कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को कोर्ट और ट्रायल (मुकदमे) का सामना करने के लिए सिर्फ इसलिए नहीं बुलाया जा सकता क्योंकि उस पर आरोप लगे हैं।प्रथम दृष्टया (पहली नजर में) अपराध के जरूरी लक्षण दिखने पर ही समन जारी होना चाहिए।यह फैसला कानूनी रूप से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक मामलों में निष्पक्ष जांच को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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