लापता व्यक्ति की उम्र या जेंडर नहीं बनेगा बहाना; सुप्रीम कोर्ट की राज्यों को सख्त चेतावनी – “तुरंत दर्ज करें FIR, वरना भुगतें अवमानना”

अब किसी भी लापता व्यक्ति की शिकायत पर पुलिस उम्र या जेंडर का बहाना नहीं बना सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक आदेश देते हुए कहा है कि हर गुमशुदगी पर तुरंत FIR दर्ज करना अनिवार्य होगा, आदेश की अनदेखी करने वाले राज्यों पर अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।

News Diary Today | Supreme Court |

दिल्ली न्यूज़ | सुप्रीम कोर्ट ने G.Ganesh v. State of Tamil Nadu मामले में ऐतिहासिक आदेश दिया है कि देश में किसी भी व्यक्ति की गुमशुदगी की शिकायत मिलते ही पुलिस को अनिवार्य रूप से तुरंत FIR दर्ज करनी होंगी। कोर्ट ने साफ किया कि यह नियम हर उम्र और हर जेंडर (लिंग) के व्यक्ति पर समान रूप से लागू होता है।किसी भी व्यक्ति के लापता होने पर बिना किसी प्रारंभिक जांच (Preliminary Inquiry) के तुरंत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है।कुछ राज्य समझ रहे थे कि यह नियम केवल बच्चों के लिए है। कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए कहा कि “व्यक्ति” शब्द में बच्चे और वयस्क (Adults) दोनों शामिल हैं।आदेश न मानने वाले राज्यों के मुख्य सचिवों और डीजीपी (DGP) को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा और उन पर अवमानना (Contempt) की कार्रवाई हो सकती है। बता दें कि यह मामला चेन्नई के रहने वाले जी. गणेश नामक व्यक्ति की याचिका से शुरू हुआ था, जिनकी नाबालिग बेटी साल 2011 में चेन्नई से लापता हो गई थी। पुलिस द्वारा इस मामले को ‘ढूंढा नहीं जा सका’ (Undetectable) कहकर बंद करने के बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। देश में बढ़ती मानव तस्करी (Human Trafficking) और लापता बच्चों की गंभीर स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया और इसका दायरा पूरे देश के लिए बढ़ा दिया।

राज्यों के ‘बहाने’ पर कोर्ट की फटकार!

इससे पहले 22 मई, 2026 को दिए आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने लापता “व्यक्ति” के मामलों में तुरंत एफआईआर करने को कहा था। लेकिन कुछ राज्यों ने कोर्ट में यह दलील दी या ऐसा मानकर काम किया कि “व्यक्ति” शब्द का मतलब सिर्फ ‘लापता बच्चों’ से है।जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने राज्यों की इस व्याख्या पर कड़ा ऐतराज जताया। कोर्ट ने इसे “जानबूझकर और गलत नीयत से खड़ा किया गया बहाना” (deliberate and mala fide bogey) करार दिया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि चाहे कोई पुरुष हो, महिला हो, बच्चा हो या बुजुर्ग—गुमशुदगी की रिपोर्ट आते ही पुलिस स्टेशन के काउंटर पर डायरी एंट्री (गुमशुदगी की रपट) काटने के बजाय सीधे FIR दर्ज करनी होगी।इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन के लिए कई अन्य कड़े नियम भी बनाए हैं। कोर्ट ने कहा है कि यदि कोई बच्चा लापता होता है, तो पुलिस को शुरुआत से ही इसे अपहरण या मानव तस्करी का मामला मानकर जांच करनी होगी।इन एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत अपहरण और तस्करी से जुड़ी प्रासंगिक धाराएं अनिवार्य रूप से जोड़ी जाएंगी।जैसे ही कोई लापता व्यक्ति या बच्चा बरामद होता है, सबसे पहले उसका आधार वेरिफिकेशन कराया जाए या नया आधार कार्ड बनवाया जाए। चूंकि आधार के लिए बायोमेट्रिक्स (उंगलियों के निशान आदि) लिए जाते हैं, इससे यह तुरंत पता चल जाएगा कि वह व्यक्ति पहले से सिस्टम में दर्ज है या नहीं, जिससे उसे परिवार से मिलाना आसान होगा।बरामद किए गए बच्चों को 24 घंटे के भीतर उनके परिवार को सौंपना होगा, बशर्ते परिवार खुद तस्करी में शामिल न हो।

आम जनता के लिए इसका क्या मतलब है ?

यदि आपका कोई परिचित या रिश्तेदार लापता होता है और आप पुलिस स्टेशन जाते हैं, तो पुलिस यह कहकर मना नहीं कर सकती कि व्यक्ति वयस्क (Adult) है, इसलिए FIR नहीं होगी।केवल गुमशुदगी की रपट (Missing Report) लिखवाने के बजाय उचित धाराओं में एफआईआर दर्ज कराएं और उसका नंबर लें।यदि पुलिस आनाकानी करती है, तो आप इस सुप्रीम कोर्ट के आदेश (G. Ganesh v. State of Tamil Nadu) का हवाला देकर मामले को वरिष्ठ अधिकारियों के सामने लिखित में उठा सकते हैं।इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर को तय की गई है, जहां नियमों का पालन न करने वाले राज्यों को जवाब देना होगा।

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