नोएडा के डॉ. राहुल वर्मा को हाईकोर्ट से क्लीन चिट; आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन करने वाले डॉक्टरों को मिला सुरक्षा कवच।

नोएडा के सरकारी डॉक्टर राहुल वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उनके खिलाफ FIR दर्ज करने के मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने BNSS की धारा 175(4) के तहत लोकसेवकों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी बताया।

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Noida/ prayagraj: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा के सरकारी डॉक्टर राहुल वर्मा को बड़ी राहत देते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत किसी भी लोकसेवक के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले कानूनी प्रक्रिया और उनके अधिकारों का पालन करना अनिवार्य है। बता दें कि यह पूरा प्रकरण नोएडा के यथार्थ अस्पताल से संबंधित है, जहाँ एक मरीज के इलाज में हुई कथित लापरवाही के बाद यह विवाद खड़ा हुआ था। गौतमबुद्ध नगर के एसीजेएम (ACJM) प्रथम की अदालत ने गत 12 अगस्त 2026 को एक आदेश जारी किया था, जिसमें डॉक्टर राहुल वर्मा के खिलाफ सीधे प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश और इसके बाद शुरू हुई दंडात्मक कार्यवाही के खिलाफ डॉ. वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया था।डॉ. राहुल वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव ने मजिस्ट्रेट के उस आदेश को कानूनन गलत ठहराया। अदालत ने मामले के रिकॉर्ड खंगालने के बाद निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिंदु सामने रखे।रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं पाया गया जो डॉ. राहुल वर्मा को शिकायतकर्ता की पत्नी के उपचार या सर्जरी से सीधे तौर पर जोड़ता हो।डॉ. वर्मा केवल मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) द्वारा गठित एक आधिकारिक जांच समिति के सदस्य थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समिति के सदस्य के रूप में की गई उनकी कार्रवाई को किसी भी तरह से आपराधिक साजिश नहीं माना जा सकता।कोर्ट ने ओम प्रकाश अंबेडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले का जिक्र करते हुए कहा कि प्रक्रियागत नियमों की अनदेखी कर किसी भी सरकारी कर्मचारी पर मुकदमा चलाना पूरी तरह अनुचित है।

नया कानून (BNSS) और लोकसेवकों को मिली वैधानिक सुरक्षा!

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(4) का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि यह धारा अपने आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन करने वाले लोकसेवकों को एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच प्रदान करती है। इस नियम के तहत, किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ जांच का आदेश देने से पहले संबंधित वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट लेना अनिवार्य है।आरोपी लोकसेवक का पक्ष सुनना (सुनवाई का अवसर देना) आवश्यक है। चूंकि एसीजेएम कोर्ट ने डॉ. वर्मा से कोई जवाब मांगे बिना और उनका पक्ष सुने बिना सीधे एफआईआर का आदेश दे दिया था, इसलिए हाईकोर्ट ने इसे नियमों का खुला उल्लंघन माना और पूरी आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।यह फैसला न्यायिक और प्रशासनिक हलकों में काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह आदेश साफ करता है कि शिकायत मिलने पर बिना किसी पुख्ता सबूत या विभागीय प्रारंभिक रिपोर्ट के डॉक्टरों अथवा जांच समितियों के सदस्यों को सीधे आरोपी नहीं बनाया जा सकता।यह निर्णय निचली अदालतों (मजिस्ट्रेटों) को याद दिलाता है कि नए दंडात्मक कानूनों (BNSS) के तहत लोकसेवकों को दी गई वैधानिक सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती।

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