News Diary Today | Mythology Diary
उत्तराखंड: देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित चमोली जिले का द्रोणागिरी गांव भारत की उन विरल जगहों में से एक माना जाता है, जहां आज भी हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती। स्थानीय लोक-परंपरा के अनुसार, यह वही पर्वत है जिसे त्रेतायुग में हनुमान जी संजीवनी बूटी की खोज के दौरान उठाकर लंका ले गए थे। इसी घटना के कारण यहां के लोग आज भी अपने आराध्य पर्वत देवता की पूजा करते हैं, लेकिन हनुमान जी के प्रति नाराजगी की परंपरा पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं।
लक्ष्मण की मूर्छा और संजीवनी बूटी की कथा
रामायण के अनुसार, लंका युद्ध के दौरान मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे। उनकी गंभीर स्थिति देखकर भगवान श्रीराम चिंतित हो उठे। वैद्यों ने बताया कि उनके प्राण बचाने के लिए हिमालय में मिलने वाली संजीवनी बूटी ही एकमात्र उपाय है।
इसके बाद हनुमान जी लंका के राजवैद्य सुषेण को उनके घर सहित युद्धभूमि में ले आए। सुषेण वैद्य ने संजीवनी बूटी लाने का निर्देश दिया। जब हनुमान जी हिमालय पहुंचे तो उन्हें रात के अंधेरे में संजीवनी बूटी की पहचान नहीं हो सकी। समय कम था, इसलिए उन्होंने पूरा पर्वत ही उखाड़कर लंका पहुंचा दिया। वहां सुषेण वैद्य ने संजीवनी बूटी पहचानकर लक्ष्मण का उपचार किया और उनके प्राण बच गए। इसके बाद हनुमान जी पर्वत को पुनः उसके मूल स्थान पर स्थापित कर आए।
कहां स्थित है द्रोणागिरी पर्वत?
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यही पर्वत आज उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित द्रोणागिरी पर्वत है। इसकी तलहटी में बसा द्रोणागिरी गांव जोशीमठ प्रखंड के नीति घाटी क्षेत्र में, भारत-तिब्बत सीमा के निकट स्थित है।
- जोशीमठ से लगभग 50 किलोमीटर दूर मलारी मार्ग पर स्थित।
- जुम्मा गांव से पैदल मार्ग द्वारा पहुंचा जाता है।
- समुद्र तल से लगभग 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित।
- दूनागिरी ग्लेशियर भी इसी पर्वत श्रृंखला का हिस्सा माना जाता है।
दुर्लभ जड़ी-बूटियों का खजाना माना जाता है द्रोणागिरी
द्रोणागिरी पर्वत को हिमालयी औषधीय वनस्पतियों का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यहां आज भी कई दुर्लभ जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। आयुर्वेद और लोक परंपराओं में भी इस क्षेत्र का विशेष उल्लेख मिलता है।
वर्ष 2008 में पतंजलि योगपीठ के स्वामी बालकृष्ण द्वारा यहां जड़ी-बूटियों की खोज के लिए किए गए अभियान के बाद यह पर्वत एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था।
आखिर गांव के लोग हनुमान जी की पूजा क्यों नहीं करते?
द्रोणागिरी गांव के लोग पर्वत को अपना ‘पर्वत देवता’ मानकर उसकी पूजा करते हैं। स्थानीय लोक-मान्यता के अनुसार, जब हनुमान जी संजीवनी बूटी की पहचान न कर पाने के कारण पूरा पर्वत ही उखाड़कर ले गए, तब गांव के लोगों को अपने आराध्य पर्वत के इस प्रकार ले जाए जाने का गहरा दुख हुआ।
इसी घटना से जुड़ी नाराजगी आज भी गांव की परंपरा का हिस्सा बनी हुई है। यही कारण है कि—
- गांव में हनुमान जी का कोई मंदिर नहीं है।
- हनुमान जी की पूजा नहीं की जाती।
- कई परिवार आज भी हनुमान जी का नाम लेने से बचते हैं।
- लाल रंग का झंडा फहराना भी परंपरागत रूप से वर्जित माना जाता है, क्योंकि इसे हनुमान जी से जोड़ा जाता है।
- प्रत्येक वर्ष गांव में विशेष रूप से पर्वत देवता की पूजा-अर्चना की जाती है।
क्षेत्र से जुड़ी अन्य मान्यताएं
चमोली और कुमाऊं क्षेत्र में द्रोणागिरी से जुड़ी कई अन्य मान्यताएं भी प्रचलित हैं।
- अल्मोड़ा जिले के द्वाराहाट के पास स्थित दूणागिरी धाम के बारे में मान्यता है कि हनुमान जी जब पर्वत लेकर जा रहे थे, तब उसका एक हिस्सा यहां गिर गया था।
- कुछ धार्मिक परंपराओं में यह भी माना जाता है कि संजीवनी पर्वत का संबंध श्रीलंका के प्रसिद्ध एडम्स पीक से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इस संबंध में अलग-अलग धार्मिक और लोक मान्यताएं मौजूद हैं।
आस्था और इतिहास के बीच एक अनोखी परंपरा
द्रोणागिरी गांव की यह परंपरा भारतीय लोक-आस्था और सांस्कृतिक विरासत का एक अनूठा उदाहरण है। वैज्ञानिक रूप से इन मान्यताओं की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सदियों से यहां के लोग इन्हें अपनी परंपरा का हिस्सा मानते आए हैं।
आज भी द्रोणागिरी गांव में पर्वत देवता की पूजा, हनुमान जी की पूजा का निषेध और लाल झंडे से परहेज जैसी परंपराएं स्थानीय सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। यही वजह है कि यह गांव श्रद्धालुओं, इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए हमेशा आकर्षण का केंद्र बना रहता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख विभिन्न पौराणिक ग्रंथों, लोक-परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है। इन मान्यताओं की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। न्यूज़ डायरी टुडे इन धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए उन्हें केवल जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत कर रहा है।