दिल्ली के सरकारी बंगले से मिले करोड़ों के कैश मामले में जांच समिति ने पूर्व जस्टिस यशवंत वर्मा को तीनों आरोपों में दोषी ठहराया है। रिपोर्ट में स्टोर रूम की बदली स्थिति, गायब हुए नोटों और जस्टिस वर्मा के बदलते बयानों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं।
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नोएडा न्यूज़ | लोकसभा की तीन सदस्यीय जांच समिति ने पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास से मिले भारी कैश से जुड़े मामले में तीनों आरोपों के तहत पूरी तरह दोषी पाया है। संसद के दोनों सदनों में आज पेश की गई इस अंतिम रिपोर्ट ने देश के न्यायिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मचा दी है। यह जांच रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाले पैनल द्वारा सौंपी गई है। बता दें कि यह सनसनीखेज मामला 14 मार्च 2025 की रात का है, जब नई दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी बंगले के स्टोर रूम (आउटहाउस) में अचानक आग लग गई थी। जब दमकल विभाग के कर्मचारी वहां आग बुझाने पहुंचे, तो उन्हें मलबे के बीच ₹500 के नोटों के ढेर (लगभग 1.5 फीट ऊंचे बंडल) बिखरे हुए मिले। इस घटना के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक आंतरिक समिति बनाई और बाद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। विवाद बढ़ता देख जस्टिस वर्मा ने अप्रैल 2026 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोर रूम से ₹500 के नोटों के भारी बंडल बरामद हुए थे।पूर्व न्यायाधीश यह बताने में पूरी तरह नाकाम रहे कि इतनी बड़ी नकदी किसकी थी, कहां से आई थी और उनके सरकारी घर में क्यों छुपाकर रखी गई थी।कैश मिलने के बाद सबूतों को सुरक्षित और सील रखने के जरूरी प्रयास नहीं किए गए।जांच और सीलिंग की कार्रवाई शुरू होने से ठीक पहले ही स्टोर रूम की स्थिति को बदल दिया गया। बाद में वहां से करेंसी नोट भी गायब पाए गए। कमेटी ने माना कि जस्टिस वर्मा ने परिसर के प्रभारी होते हुए सबूतों को सुरक्षित रखने में आवश्यक सावधानी नहीं बरती। हालांकि, कमेटी ने स्पष्ट किया कि इसके सीधे सबूत नहीं हैं कि खुद जस्टिस वर्मा ने वहां जाकर पैसे हटाए थे।जस्टिस वर्मा द्वारा जांच कमेटी के सामने दी गई सफाई (विशेषकर 22 मार्च के जवाब में) विरोधाभासों से भरी थी।उन्होंने समय के साथ अपने बयान बदले। शुरुआत में उन्होंने नकदी की बात से पूरी तरह इनकार किया और बाद में इसे फंसाने की साजिश या प्लांटिंग करार दिया। कमेटी ने उनके इस रुख को टालने वाला (Evasive) और स्वतंत्र गवाहों व अन्य सबूतों से पूरी तरह बेमेल पाया।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और आगे क्या?
जांच के अंतिम चरण में जस्टिस वर्मा ने खुद को इन कार्यवाहियों से अलग कर लिया था और गवाहों की सूची भी पेश नहीं की थी। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने इस मामले में एफआईआर (FIR) दर्ज करने या अदालत की निगरानी में एसआईटी (SIT) जांच की मांग वाली याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह मामला पहले से ही संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया के दायरे में है।समिति की इस अंतिम रिपोर्ट के संसद के पटल पर आने के बाद अब देखना होगा कि पूर्व न्यायाधीश के खिलाफ आगे क्या आपराधिक और कानूनी कदम उठाए जाते हैं।