सावन में मीट बंदी का विवाद पहुंचा हाई कोर्ट, बिना तारीख के नोटिस पर भड़की अदालत, DM-SP से जवाब तलब!

सावन में मीट की दुकानों को बंद कराने का मामला अब इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंच गया है। अमरोहा प्रशासन के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए DM-SP से जवाब मांगा है, जबकि बिना तारीख वाले नोटिस जारी करने वाले इंस्पेक्टर को व्यक्तिगत रूप से तलब किया है

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UP HIGH Court | इलाहाबाद हाई कोर्ट में सावन के महीने के दौरान चिकन-मटन दुकानों को बंद करने के अमरोहा प्रशासन के आदेश को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है। अमरोहा के समाजसेवी और वरिष्ठ अधिवक्ता हाजी नासिर फारूकी द्वारा दायर इस याचिका पर हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमरोहा के जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) से लिखित जवाब मांगा है। इसके अलावा, बिना तारीख और नाम के (अनडेटेड) नोटिस जारी करने वाले स्थानीय इंस्पेक्टर को कोर्ट ने व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया है। बता दें कि याचिकाकर्ता ने स्थानीय पुलिस और प्रशासन द्वारा चिकन-मटन दुकानों को बंद करने के लिए जारी किए गए अनडेटेड (बिना तारीख और नाम वाले) नोटिस को अवैध और असंवैधानिक बताया है।याचिका में आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने उन अंदरूनी गलियों और मोहल्लों की दुकानों को भी जबरन बंद करवा दिया है, जिनका कांवड़ यात्रा के मुख्य मार्ग से कोई लेना-देना नहीं है।याचिका में दलील दी गई है कि इस एकतरफा फैसले से रोजाना 400-500 रुपये कमाने वाले छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और सैकड़ों गरीब परिवारों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।प्रशासन के नोटिस में केवल सावन के चार सोमवारों का जिक्र किया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर पुलिस पूरे 30 दिनों तक दुकानों को नहीं खुलने दे रही है।इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अमरोहा के जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कप्तान से लिखित जवाब मांगा है।दुकानदारों को बिना नाम और तारीख के मनमाने नोटिस थमाने वाले अमरोहा कोतवाली के इंस्पेक्टर को अदालत ने व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया है।

याचिकाकर्ता का पक्ष!

याचिकाकर्ता हाजी नासिर फारूकी ने स्पष्ट किया कि वे हिंदू धर्म, सनातन परंपराओं और कांवड़ यात्रा का पूरा सम्मान करते हैं। मुख्य कांवड़ मार्गों पर सुरक्षा और धार्मिक आस्था के लिहाज से उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन जिन मुस्लिम बहुल या अंदरूनी इलाकों का यात्रा से कोई सीधा संबंध नहीं है, वहां पूरी तरह से व्यापार बंद करा देना मानवाधिकारों और आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है और याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट से हस्तक्षेप कर इन अनडेटेड और मनमाने नोटिसों को तुरंत रद्द करने की मांग की है।

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